लोरियान एक ऐतिहासिक स्थल है, जो पेशावर पाकिस्तान में स्थित है। प्राचीन बौद्धकालीन समय में पेशावर को पुरुषपुर कहा जाता था… चीनी बौद्ध भिक्खु ह्यू- एन- त्संग कभी, प्राचीन सिल्क मार्ग से लोरियन तांगाई आये थे। उन्होंने इस इलाक़े के एक बड़े बौद्ध स्तूप का अपने यात्रा वर्णन में उल्लेख किया है। मुस्लिम आक्रमणकारियों ने बड़े स्तूप को पूर्णतः नष्ट कर दिया… जो कुछ अवशेष अब बचे हैं, वे एक छोटे स्तूप के ही हैं… उनमें यह पेशावर के उत्खनन में प्राप्त हुआ है। छोटे गोलाकार स्तूप की गोलाई में तथागत बुद्ध की मूर्तियाँ दिखाई पड़ती हैं…. इसे देखकर बड़ा स्तूप कैसा रहा होगा, इसका अनुमान लगाया जा सकता है। ————————–
🌷 प्रतिपदा सुत्त 🌷
भिक्खुओं, ये चार प्रतिपदा (जीवन विधियाँ) है। कौन-सी चार ?
अक्षमा-प्रतिपदा, क्षमा-प्रतिपदा, दमन-प्रतिपदा तथा शमन प्रतपिदा ।
1)
भिक्खुओं, एक आदमी गाली देनेवाले को गाली देता है, क्रोध प्रकट करनेवाले को प्रति क्रोध प्रकट करता है, झगडने वाले के साथ झगडता है । भिक्खुओं, यह अक्षमा-प्रतिपदा है।
2)
भिक्खुओं, क्षमा-प्रतिपदा किसे कहते है ?
भिक्खुओं, एक आदमी गाली देनेवाले को गाली नही देता, क्रोध प्रकट करने वाले प्रति क्रोध प्रकट नहीं करता, झगडने वालेके साथ झगडा नहीं करता। भिक्खुओं, यह क्षमा-प्रतिपदा है।
3)
भिक्खुओं, दमन-प्रतिपदा क्या है ?
भिक्खुओं, भक्खुओं अपनी आँख से किसी सुन्दर रूपको देखता है। वह उसमें न आँख गडाता है, न आनंद लेता है, क्योकि कहीं चक्षु के असंयम से लोभ-द्वेष आदि अकुशल पापमय विचार घर न कर लें। उन पापमय विचारो को दूर रखने के लिये प्रयत्न करता है, अपनी आँख को काबू मे रखता है, अपनी आँख पर संयम रखता है। वह अपने कान से शब्द सुनता है, नासिका से सुगन्धि सूंघता है जिह्वा से रस चखता है शरीर से स्पर्श करता है मन से चिंतन करता है, लेकिन उसमें न मन गडाता है, न आनंद लेता है, क्योकि कहीं मन के असंयम से लोभ-द्वेष आदि अकुशल पापमय विचार घर न कर लें । उन पापमय विचारो को दूर रखने के लिये प्रयत्न करता है, अपने मन को काबू में रखता है, अपने मन पर संयम रखता है । भिक्खुओं, यह दमन-प्रतिपदा है।
4)
भिक्खुओं, शमन-प्रतिपदा क्या है ?
भिक्खुओं, भिक्खु के मन मे जो काम-वितर्क उत्पन्न हुआ है उसे वह स्थान नही देता, छोड देता है, नष्ट कर देता है, मिटा देता है, जो क्रोध उत्पन्न हुआ है उसे वह स्थान नहीं देता, छोड देता है, नष्ट कर देता है, मिटा देता है, जो हिंसक विचार उत्पन्न हुआ है उसे वह स्थान नहीं देता है, छोड देता है, नष्ट कर देता है, मिटा देता है। भिक्खुओं, यह शमन-प्रतिपदा है। भिक्खुओं, ये चार प्रतिपदा है ।
भवतु सब्ब मंगलम
भवतु सब्ब मंगलम
**सबका मंगल हो**

सबका कल्याण हो

★ सब सुखी रहें ★


प्रश्न: भिक्खु और भिक्षु/भिक्षुक में क्या अंतर है? बौद्धो में भिक्खु का इतना आदरभाव क्यों है। 🌹🌺🌹🌺🌹🌺🌹🌺🌹🌺🌹🌺🌹🌺🌹
उत्तर:-
भिक्षु या भिक्षुक का सामान्य अर्थ याचक अर्थात भिखारी है। जबकी भिक्षु और भिक्खु दो अलग-अलग अर्थ वाले शब्द हैं। जिनका दूर-दूर तक अर्थ समान नहीं है। फिर भी इनके समानार्थी जान एक ही अर्थ में प्रयोग किया जाता है। भिक्षु या भिक्षुक पाली भाषा के ‘भिक्खु ‘ शब्द का गलत संस्कारित रूप है। चूँकि दोनों शब्दों की परिभाषा ही भिन्न है।
भिक्षुक का अर्थ दरिद्र, पतित दुःखी भिखारी से लिया जाता है। जो भीख(भिक्षा) मांगकर जीवन यापन करता है। ऐसे पतित दरिद्र और दुःखी जीवन यापन करने वाले, भिक्षा पर जीवन यापन करने वाले व्यक्ति के लिये पाली में ‘याचको’ शब्द है जिसका अर्थ भिखारी होता है। जबकि एक भिक्खु एक धम्म के प्रति समर्पित ‘सद्धावान, सीलवान, और पञ्ञावान’ साधक होता है जिसका दरिद्रता,पतितता,प्रमाद के जीवन आदि से कोई सम्बन्ध नहीं होता। वह तो समण है जो अपने विकारों का शमन करने का मानसिक श्रम करता है। वह कभी भी किसी से भी भिक्षा की याचना नहीं करता। और न ही संग्रहण ही करता है। वह तो केवल दिए गए दान को स्वीकार करता है। वह भी उतना जितना जीवन यापन के लिये आवश्यक है।
भिक्खु को दिए गए भोजनदान को समझने के लिये मेहमान को परोसे गए भोजन का उदहारण ले सकते हैं। एक मेहमान भोजन की मांग नहीं करता लेकिन हम उसे आदरपूर्वक जलपान फिर भी ग्रहण करने के लिये देते है। यह उदहारण सटीक तो नहीं लेकिन सहायक जरूर है। जबकि एक भिक्खु को दिया गया पिण्डपात (भोजनदान) इस आदरपूर्वक दिए गए जलपान से कहीं श्रेष्ठ और फलदायी है।
बौद्ध धम्म की संस्कृति और मान्यताओं और ग्रन्थों के अनुसार एक भिक्खु को भोजन-दान श्रध्दापूर्वक, दान के महत्व और फल को जानकर किया जाता है। इसका इतना महत्व है कि एक सद्धावान, सीलवान, और पञ्ञावान’ भिक्खु के अतिरिक्त यदि एक दुष्शील भिक्खु को भी यदि पिण्डदान किया जाता है तो यह भी कई जन्मों तक फलित होता है। यह प्रताप है एक भिक्खु को भोजनदान का।
भिक्खु का अर्थ है जिसने सभी प्रकार के पापधर्मो को छोड़ दिया है और पुण्य को भी पकड़ कर नही रखा है।अर्थात जिसने लोहे ही बेड़ियों को काट दिया है। और सोने की बेड़ियों को भी पैरों में नही डाला। जिनका शास्ता(गुरु) केवल धम्म है। भिक्खु एक प्रज्ञावान साधक है जो मन, काया, वाणी और इंद्रियों को संयमित करने में लगा है। जो धम्म का मनन और उसे धारण करता है जिसका कोई आगार(घर) नहीं है। जो पँचस्कन्द रूपी शरीर को भी अपना नहीं स्वीकारता।और अपना शेष जीवन धम्मानुसार जीता है।
“धम्मारामो धम्मरतो धम्मं अनुविचिन्तयं।
धम्म अनुस्सरं भिक्खु सद्धधम्मा न परिहायति।।(5)”
(धम्मपद, भिक्खु वग्ग, गाथा 364)
अर्थात: धम्म में रमण करने वाला, धम्म में रत होने वाला,धम्म का चिंतन करने वाला, धम्म का अनुसरण करने वाला भिक्खु सद्धम्म से च्युत नहीं होता।
सब्बसो नामरूपस्मिं यस्स नत्थि ममायितं।
असता च न सोचति स वे भिक्खू’ति वुच्चति।।(8)
(धम्मपद, भिक्खु वग्ग, गाथा 367)
अर्थात: जिसकी नामरूप पंचस्कन्धों में बिल्कुल ही ममता नही, और जो उनके नहीं होने पर शोक नही करता वही भिक्खु कहा जाता है।
भक्खु अनुशासन और नियम
___________________एक भिक्खु अनुशासित जीवन यापन करता है उसकी वेशभूषा (चीवर) और सम्पूर्ण दिनचर्या अनुशासित होती है। एक भिक्खु विनय के 227 सीलों(शीलों) का पालन करता है। वहीं एक भिक्खुणी 311 विनय सीलों का पालन करती है। दोनों ही लोक कल्याण और बहुजन हित और कल्याण की भावना से धम्म की देशना की मंगल कामनायें करते हैं। कोई भी व्यक्ति भिक्खु या भिक्खुणी नहीं बना सकता है। संघ में इसके लिये विशेष योग्यता नियम हैं। सर्वप्रथम एक व्यक्ति विशेष जो भिक्खु/भिक्खुणी बनने का इच्छुक है वह अपराधी न हों, शरीरिक और मानसिक रूप से सक्षम और परिपूर्ण होना आवश्यक है। इन सभी नियमों और अन्य नियमों को पूर्ण करने के बाद ही वह चीवर धारण कर प्रारम्भ में 10 विनय सीलों का पालन करता है। और लगभग दस वर्षों तक त्रिपिटक आदि का अध्धयन करता है और श्रामणेर कहा जाता है। तदुपरान्त बौद्ध विहार या गोम्पा के गुरू भक्खुओं द्वारा ली जाने वाली परीक्षा में उत्तीर्ण होकर एक श्रामणेर एक भिक्खु/भिक्खुणी बनता या बनती है। इसके बाद भी प्रत्येक वर्षावास पर पवारणा के अवसर पर एक भिक्खु 227 विनय सीलों में किन्ही कारणों वश हो गई त्रुटियों को नियमित तौर पर सुधारने का पूर्ण प्रयास करता है। विहार के नियमों का सभी भक्खुओं और भिक्खुणी पालन करते हैं। भक्खुओं के अनुशासन के बारे में एक गाथा धम्मपद में है। सुमन श्रामणेर को ‘दायज्य उपसम्पदा’ के बाद भगवान ने यह गाथा कही:- “यो हवे दहरो भिक्खु युञ्जति बुद्ध सासने। सो इमं लोकं पभासेति अब्भा मुत्तो’व चन्दिमा।।” (धम्मपद, भिक्खु वग्ग, गाथा 367) अर्थात जो अपव्यस्क भिक्खु बुद्ध अनुशासन में संलग्न होता है। वह मेघ से मुक्त चंद्रमा की भांति इस लोक को प्रकशित करता है। क्या दुनियां का कोई भी भिखारी(भिक्षुक) इतना अनुशासित और सभ्य जीवन यापन करते कहीं देखा जाता है? इस पर हम सभी का उत्तर नहीं ही आएगा। परन्तु एक भिक्खु ऐसा अनुशासित जीवन जीता है। एक बुद्ध,धम्म और संघ में श्रद्धा रखने वाला सीलवान और पञ्ञावान भिक्खु प्रत्येक क्षण होशपूर्वक जीवन जीता है या जीने का प्रयास करता है। वरिष्ठ बौद्ध भिक्खु को बौद्धों में भंते या भद्दन्त या भदन्त भी कहा जाता है। जिसका अर्थ आदरणीय, पूज्नीय से है। बौद्ध धम्म में भिक्खुओं का इतना आदरभाव था कि राजा भी किसी भिक्खु को देख रथ से उतरकर नमन किया करते थे। ऐसा वर्णन हमे प्राप्त होता है। आज भी एक भिक्खु को कितने आदरभाव से एक उपासक भोजनदान करता है यह हमें भोजन दान करते समय चली आ रही रीति से मालूम होता है। एक श्रध्दावान उपासक भोजनदान करते समय भिक्खु से निवेदन करते हुए कहता है कि: अधिवासेतु नो भन्ते, भोजनं परिकप्पितं अनुकम्पं उपादाय पटिगण्हातु उत्तमं अर्थात: हे भन्ते जी, हमारे द्वारा भोजन पक कर तैयार हो चुका है, अनुकम्पा करके भली प्रकार से भोजन गृहण करें। इस पर भिक्खु पात्र में जो मिल जाए उसे अनुमोदन करते हुए, भवतु सब्ब मंगलम् रक्खन्तु सब्ब देवता, सब्ब बुद्धानुभावेन,धम्मानुभावेन,संघानुभावेन सदा सोत्थि भवन्तु ते, साधु साधु साधु इत्यादि कहते हुए स्वीकार करता है। क्या इतने आदरभाव से किसी भिखारी(भिक्षुक/भिक्षु) को दान देते हुए देखा जाता है? उत्तर नहीं में ही आएगा। परंतु यह आदरभाव एक भिक्खु को प्राप्त होता है। भिक्खुओं में पहले भिक्खा फिर धम्म देशना का नियम है। धम्म देशना के बाद दान स्वीकार नहीं क्या जाता। क्या अपने किसी भिखारी (भिक्षुक) को धम्म देशना देते सुना है? उत्तर नहीं में ही आयेगा। परन्तु भिक्खु बहुजन हिताय और बहुजन सुखाय के लिये धम्म देशना करते हैं।भिक्खु एक गुरु की भांति है इसलिये बौद्धो में संघ और गुरु वंदना का भी नियम है। इसी आदरभाव से बहुजन उनका अभिवादन ‘वन्दामि भन्ते’ कहकर करते है। समाज में जिस भिक्खु का इतना आदरभाव हो क्या उन्हें भिखारी कहा जा सकता है? इसके विपरीत क्या एक भिखारी आदरणीय हो सकता है। एक भिक्खु जिन्हें तृप्ति के लिये धम्म ज्ञान की भूख है और एक भिखारी जिसे केवल पेट की भूख है । क्या दोनो की तुलना की जा सकती है। जो दरिद्र भिखारी स्वयं दुःखी और पतित जीवन जीता है। उसके पास दुःख से मुक्ति का कोई उपाय ही नहीं है। उसके आशीर्वाद से भला कौन दुःख मुक्त हो सकता है। जिसका लोकल्याण और लोकहित से कोई सम्बन्ध ही नहीं। जबकि वह भी दुःख मुक्ति का अधिकारी है। बौध्द भिक्खुओं को समण (संस्कारित शब्द श्रमण) भी कहा जाता है। समण का अर्थ होता है जो रोग,द्वेष और मोह को का समन करने के लिये प्रयत्नशील है और समता का आचरण करता है। तथा निर्वाण (मुक्त अवस्था) को अपनी समाधि (ध्यान साधना), प्रज्ञा, शीलपालन, आदि से प्राप्त करने के लिये प्रयासरत है।* बाहितपापोति ब्राह्मणों सम चारिया समणोति वुच्चति। पब्बाजयमत्तनो मलं तस्मा पब्बजितोति वुच्चति।। -धम्मपद,ब्राह्मण वग्ग, 388 अर्थात जिसने पापधर्म(राग आदि) को धोकर बहा दिया,इसलिये वह ब्राह्मण है। जो समता का आचरण करता है, वह समण(श्रमण) है। (चूंकि) उसने अपने चित्तमलों को हटा दिया है इसलिए वह प्रवज्जित कहा जाता है। एक भिक्खु उस कम मूल्य के भगवा वस्त्र को पहनता है जिसे भगवान धारण किया करते थे। और जो शवों के कफ़न और दान से प्राप्त किया जाता था। जिसे भगवा रंगा जाता था और जिंसमे विभिन्न प्रकार के जोड़ होते हैं। भिक्खु कभी भी भिक्खाचार के दौरान भिक्खा(भोजनदान) नहीं मांगते वे द्वार पर मौन खड़े रहते हैं।उपासक भिक्खापात्र में जो भी दे। अनासक्त भाव से उसे शरीर चलायमान करने के लिये स्वीकारते हैं। भिक्खाचार के लिए भिक्खु सुबह 12 बजे तक ही अधिकतम 7 घरों तक ही मौन रहकर भिक्खाचार करते हैं। वह भी न मिलने पर भूखे ही सोते हैं। इसलिये भिक्खु दान स्वीकार कर्ता है। भिक्षुक नहीं। भिक्षु दान क्यों स्वीकार करता है? ————————–भिक्खु भिक्खा(दान) इसलिय स्वीकार करता है? क्योंकि:
1) प्रथम तो इस काया को चालयमान करने के लिये जो निर्वाण प्राप्ति और धम्म चक्र गतिमान करने के लिये सहायक है भोजन ग्रहण करना होता है।
2) दूसरे किसी और के दान पर जीवन जीना चित्त में अहंकार को जन्म नहीं लेने देता।
3) तीसरे अमुक व्यक्ति की दान पारमिता में व्रद्धि होती है।
कुछ धम्म वंचित बहुजन एक भिक्खु पर कार्य न करने की टिप्पणी करते हैं। ऐसा ही टिप्पणी जब एक धम्म वंचित ब्राहमण ने भगवान पर की तब भगवान ने ब्राह्मण से क्या कहा यह व्रतान्त मनोसात कीजिये:
कसि सुत्त: संक्षेप में कथा इस प्रकार है:-
ऐसा मैंने सुना ।
एक समय भगवान् मगध में दक्षिणागिरि पर एकनाला नामक ब्राह्मण-ग्राम में विहार करते थे ।
उस समय, बुआई के काल पर कृषि-भारद्वाज ब्राह्मण के पाँच सौ हल लग रहे थे।…..(उसी दौरान)
कृषि-भारद्वाज ब्राह्मण ने भगवान् को भिक्खा के लिये खड़ा देखा । देखकर भगवान् से यह बोला– श्रमण ! मैं जोतता और बोता हूँ। मैं जोत-बोकर खाता हूँ। श्रमण ! तुम भी जोतो और बोओ। | तुम भी जोत-बोकर खाओ। ।। ब्राह्मण ! मैं भी जोतता और बोता हूँ। मैं भी जोत-बो कर खाता हूँ।
किंतु, मैं तो आप गौतम के धुर, हल, फार, छकुनी या बैल कुछ नहीं देखता हैं। इस पर भी आप गौतम कहते हैं— ब्राह्मण ! मैं भी जोतता और बोता हूँ। मैं भी जोत-बो कर खाता हूँ। तब, कृषि-भारद्वाज ब्राह्मण भगवान् से गाथा में कहा
कृषक होने का दावा करते हैं, किंतु आप की खेती मैं नहीं देखता
कृषक पूछता है, कहें उस खेती को मैं कैसे जानू ॥
भगवान् ने कहा-
श्रद्धा बीज, तप वृष्टि, प्रज्ञा ही मेरा जुआठ और हल है, लज्जा हरिस है, मन की जोत है, स्मृति फाल-छकुनी है, शरीर और वचन से संयत, भोजन का अंदाज जाननेवाला, सत्य की निराई करता हैं, सौरत्य मेरा विश्राम है, वीर्यं मेरा लदनी बैल है, जो निर्वाण तक ले जाता है, बिना लौटे हुये बढ़ता जाता है, जहाँ जाकर शोक नहीं करता ॥ ऐसी खेती करनेवाला, अमृत की उपज पाता है, इस खेती को कर, सभी दुःखों से छूट जाता है । …
(यह धम्म उपदेश सुनकर कृषक ब्राहमण ने कहा-)
आप गौतम भोग लगावें । आप गौतम सचमुच में कृषक हैं; जो आप की खेती में अमृत की उपज होती है ।
भगवान् ने कहा-
धम्म देशना (उपदेश) करने पर मिला भोजन मुझे स्वीकार नहीं, हे ब्राह्मण ! ज्ञानियों का यह धर्म नहीं; बुद्ध,धम्म उपदेश के लिये दिये गये को स्वीकार नहीं करते, ब्राह्मण ! धम्म के रहने पर यही बात होती है ॥ ……ऐसा कहने पर कृषि-भारद्वाज ब्राह्मण भगवान् से बोला-धन्य हैं आप गौतम ! धन्य हैं !! ….. भगवान् गौतम ने अनेक प्रकार से धम्म को प्रकाशित किया है …।
अंत में हम यही कह सकते हैं कि भिक्खु धम्मराज (बुद्ध) का एक अनासक्त, शुन्यागारी, अनागारी, श्रमण(समण) धम्मरत्न है। जो कल्याण धम्म की वर्षा करता है। जो धम्म आदि, मध्य और अंत मे कल्याणकारी है।



🙏 बुध्द देशना के गुण 🙏
_

बुद्ध की देशना

“सन्दस्सेति, समादपेति,
समुत्तेजेति और सम्पहंसेति “-
तथागत बुद्ध विहार में भिक्षु परिषद को उत्साहित करने के लिए, न कि निरुत्साहित करने के लिए धर्म देशना देते थे। भगवान देशना से भिक्षु परिषद को
सन्दस्सेति,
समादपेति,
समुत्तेजेति और
सम्पहंसेति –
याने उत्साहित और आनन्दित करते थे। | धर्मदेशना देते हुए उनके मुख से जो घोष होता था वह आठ अंगों से परिपूर्ण होता था।
बुद्ध की वाणी आठ गुणों से परिपूर्ण होती थी –
[१] विसट्टो – याने विश्वसनीय और प्रामाणिक होती थी।
[२] विज्ञेय्यो -याने जानने योग्य होती है। सरलता से जानी, समझी जा सकती थी।
[३] मञ्जू – याने श्रवण-मधुर, कर्णप्रिय होती थी।
[४] सवनीयो – याने श्रवण योग्य होती है। सुनने वाले के लिए कल्याण का कारण बनती थी।
[५] बिन्दु -याने सारयुक्त होती थी। उसमें कोई शब्द निस्सार नहीं होता।
[६] अविसारी -याने कटुताविहीन होती है क्योंकि करुणा से भरी होती थी।
[७] गम्भीरो -याने गम्भीर होती है। उसमें छिछलापन नहीं होता। और
[८] निन्नादी -कांसे के बर्तन पर लगी चोट की झंकारसदृश होती है, जो सुनने वाले की हृदतंत्री को झंकृत कर देती थी।
श्रोता-परिषद जितनी बड़ी या छोटी होती थी उसी के अनुरूप उनकी आवाज तेज या धीमी होती थी। सारी परिषद उन्हें सुन पाती थी। और उससे आगे आवाज नहीं जाती । यों अपने स्वर पर उनका पूरा अधिकार रहता था। उनकी धर्मदेशना सुन कर लोग जब लौटते थे तो बिना पीठ दिखाए याने बिना मुड़े उनके दर्शनीय चेहरे को देखते-देखते चले जाते थे। उनके प्रभावशाली व्यक्तित्व और उतनी ही प्रभावशाली वक्तृता को श्रोतागण भुलाए नहीं भूल पाते। वह चिर-स्मरणीय बनी रहती थी।
इस प्रकार उत्तर माणवक ने भगवान की सारी देशना एक बार नहीं बार-बार सुनी थी। यह सब देख कर उत्तर माणवक बहुत प्रसन्न हुआ। भगवान की गुणमयी वाणी का यह सजीव विवरण प्रस्तुत करके भी वह सन्तुष्ट नहीं होआ तो अन्त में कहता है –
“एदिसो च,
एदिसो च,
सो भवं गोतमो ।”
आप गोतम ऐसे हैं, ऐसे हैं और इतना ही नहीं,
ततो च भिय्यो” -याने इससे भी कहीं अधिक हैं। कितना कहूँ?”
नमो बुद्धाय



🌺 अंधविश्वास की बेड़ियों से मुक्ति का मार्ग 🌺 __________________
– अङ्गुत्तरनिकाय १ . ३ . ६६ , केसमुत्तिसुत्त

कालामो ! किसी भी बात को
श्रुति से मत ग्रहण करो
और
न तो परंपरा से ,
न प्रथा से ,
न ग्रंथ में आने के कारण ,
न तर्क से सिद्ध होने से ,
न न्याय सिद्ध होने से ,
न सुंदर आकार का जान पड़ने से ,
न अपनी पसंद की होने से ,
न समर्थ जान पड़ने ,
तथा यह हमारे श्रमण ( गुरु ) का कथन है ‘ न ऐसा ही सोच कर ।

कालामो ! जब तुम लोग स्वयमेव जानो कि

यह बात अकुशल है ,

सदोष है ,

विज्ञों द्वारा निंदित है

और इसे भली प्रकार ग्रहण करने से दुःख एवं अहित होगा , तो कालामो ! उसे छोड़ दो।

कालामो ! जब तुम लोग स्वयमेव जानो कि यह बात

कुशल है ,

निर्दोष है ,

विज्ञों द्वारा प्रशंसित है

और उसे भली प्रकार ग्रहण करने से

सुख एवं हित होगा ,

तो कालामो ! उसे ग्रहण करके विहरो ।

” भिक्षुओ ! मेरे बचन को भी इसलिए मत ग्रहण करो कि मैं कहता हूं , अपितु भली प्रकार परीक्षा करके ही ग्रहण करो ।
सफलता एवं उन्नति का आधार “संकल्प शक्त्ति” है ———————————————–
बार तथागत बुद्ध अपने शिष्यों के साथ किसी पर्वतीय स्थल पर ठहरे थे | शाम के समय वह अपने एक शिष्य के साथ भ्रमण के लिए निकले | दोनों प्रकृति के मोहक दृश्य का आनंद ले रहे थे | विशाल और मजबूत चट्टानों को देख शिष्य के भीतर उत्सुकता जागी | उसने पूछा…इन चट्टानों पर तो किसी का शासन नहीं होगा क्योंकि ये अटल, अविचल और कठोर हैं | शिष्य की बात सुनकर बुद्ध बोले नहीं इन शक्तिशाली चट्टानों पर भी किसी का शासन है | लोहे के प्रहार से इन चट्टानों के भी टुकड़े-टुकड़े हो जाते हैं | इस पर शिष्य बोला तब तो लोहा सर्वशक्तिशाली हुआ ? बुद्ध मुस्कराए और बोले नहीं | अग्नि अपने ताप से लोहे का रूप परिवर्तित कर सकती है | उन्हें धैर्यपूर्वक सुन रहे शिष्य ने कहा मतलब अग्नि सबसे ज्यादा शक्तिवान है | नहीं बुद्ध ने फिर उसी भाव से उत्तर दिया जल अग्नि की उष्णता को शीतलता में बदलता देता है तथा अग्नि को शांत कर देता है | शिष्य कुछ सोचने लग गया | बुद्ध समझ गए कि उसकी जिज्ञासा अब भी पूरी तरह शांत नहीं हुई है | शिष्य ने फिर सवाल किया आखिर जल पर किसका शासन है ? बुद्ध ने उत्तर दिया वायु का | वायु का वेग जल की दिशा भी बदल देता है | शिष्य कुछ कहता उससे पहले ही बुद्ध ने कहा अब तुम कहोगे कि पवन सबसे शक्तिशाली हुआ | नहीं वायु सबसे शक्तिशाली नहीं है | सबसे शक्तिशाली है मनुष्य की संकल्पशक्ति क्योंकि इसी से पृथ्वी, जल, वायु और अग्नि को नियंत्रित किया जा सकता है | अपनी संकल्पशक्ति से ही अपने भीतर व्याप्त कठोरता, ऊष्णता और शीतलता के आगमन को नियंत्रित किया जा सकता है, इसलिए संकल्पशक्ति ही सर्वशक्तिशाली है | जीवन में कुछ भी महत्वपूर्ण कार्य संकल्पशक्ति के बगैर असंभव है | इसलिए अपने भीतर संकल्पशक्ति का विकास करो | सफलता एवं उन्नति का आधार : हमारी संकल्प शक्ति है |


धम्म प्रभात्


☸🙏🏻 धम्म सकाळ 🙏🏻☸
“जरा च मच्चु च, आयुं पाजेन्ति पाणिनं ।।”
अर्थात- बुढापा और मृत्यु प्राणियों की आयु को ले जाते हैं ।
अंधश्रद्धा-कर्मकांड,व्रत,भजन-कीर्तन,मूर्तिपूजा, होम-हवन आदि में पड़े मनुष्य बंधन में पड़ते हैं। उनके दु:ख बढते हैं। उनको दु:ख से मुक्ति नहीं मिलती है। अंधश्रद्धा निर्मूलन से ही मुक्ति मिलती है, सुख मिलता है। सुख की आशा रखने वाले को चाहिए शील, समाधि और प्रज्ञा का अभ्यास।
विशाखा ( मिगार माता ) ने जेतवन (श्रावस्ती) से पूर्व दिशा में एक विहार बनवाकर भिक्खुसंघ को दान में दिया था । उस विहार पुब्बाराम( पुर्वाराम) स्थान आज भग्नावशेष में तब्दील हो गया हैं। उस जगह पर गाँव बस गया हैं । लेकिन महान अशोक सम्राट के द्वारा लगाया गया शीला स्तंभ भग्नावशेष में खडा है। उस भूमि पर तथागत के चरण पडे थे, पांच वर्षावास किये गये थे और महत्वपूर्ण उपदेश दिये थे।
शीलव्रतपरामर्ष को छोड़ दें।
एक बार श्रावस्ती के पुब्बाराम विहार में उपोसथशील का पालन करने वाली 500 उपासिकाएं आयीं । विशाखा माता को जानकर आश्चर्य हुआ कि सभी महिलाएं विभिन्न ध्येय को लेकर उपोसथ कर रही हैं
– कोई वृद्ध महिलाएं का अभिप्राय था कि अगले भव में उनकी अच्छी गति हो।
– अधेड उम्र की औरतों अपने जीवन की त्रासदियों से मुक्त होने हेतु ऐसा कर रही थी ।
– जवान विवाहित युवतियों की अभिलाषा थी उन्हें पुत्र की प्राप्ति हो और
– अविवाहित युवतियों की चाह थी कि उन्हें अच्छा वर मिले ।
सभी के अपने -अपने ध्येय थे ।सभी की अपनी -अपनी मनोकामनाएं थी ।
मिगार माता विशाखा उन उपासिकाओं सहित भगवान के पास गयीं और भगवान को उपोसथ के ध्येय के बारें में बताया ।
उस समय भगवान ने उन उपासिकाओं को उपदेश देते हुए कहा –
“यथा दण्डेन गोपालो, गावो पाचेति गोचरं ।
एवं जरा च मच्चु च, आयुं पाजेन्ति पाणिनं ।।”
अर्थात
जैसे ग्वाला लाठी से गायों को चरागाह में ले जाता हैं, वैसे ही बुढापा और मृत्यु प्राणियों की आयु को ले जाते हैं ।
भगवान ने बताया –
” विशाखा ! जन्म, बुढापा और मृत्यु प्राणी के जीवन में सदैव घटित होता रहता हैं । जो जन्मा हैं, वह मरेगा । ऐसे होते हुए भी मनुष्य अपनी मुक्ति का रास्ता नहीं ढूंढता हैं ।
शीलव्रतपरामर्ष को छोड उन्हें निर्वाण का मार्ग ढूंढना चाहिए ।”
अंधश्रद्धा का त्याग ही मंगल हैं ।
☸ The Great Mauryan Empire
शिलाभिलेखों के अनुसार सही रूप ‘असोक’ (Asoka) है, जिसका संस्कृत रूपांतरण अशोक (Ashoka) है. सम्राट अशोक के पूरे नाम का उल्लेख गुर्जरा शिलालेख में मिलता है —देवानंपियस पियदसिनो असोक राजस (देवानंप्रिय प्रियदर्शी राजा अशोक).
1) मौर्य साम्राज्य के संस्थापक ~ सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य
2) मोरियवंस (मौर्य-वंश) किस ऐतिहासिक वंश/कुल की उपशाखा है ~ सक्यवंस (शाक्य-वंश)
3) मौर्य शब्द किस पालि शब्द का संस्कृत रूपांतरण है ~ मोरिय (मोरिय शब्द ‘मोर’ से बना है)।
4) मोरिय शब्द का अर्थ है ~ मोरों के प्रदेश का निवासी
5) मौर्य वंश किस वंश/कुल से संबंधित है ~ खत्तिय (जिसका संस्कृत रूपांतरण ‘क्षत्रिय’ करके वर्तमान में प्रचलित कर दिया गया है)।

खत्तिय क्या है?
महासम्मत/खेतों का अधिपति या खेतिहर/राजा।

पालि भाषा के ‘खत्तिय’ का संस्कृत रूपांतरण है वर्तमान क्षत्रिय शब्द। वह जो उचितानुचित का अनुसासन करता था। लोग उसे शालि (खेत) का भाग देते थे। महाजनों (अत्यधिक लोगों) द्वारा सम्मत होने से महासम्मत महासम्मत करके उसका पहला नाम ‘महासम्मत’ पड़ा। खेतों का अधिपति होने से खत्तिय खत्तिय करके उसका दूसरा नाम ‘खत्तिय’ पड़ा। धम्म (नैतिक नियमों) से दूसरों का रञ्जन करता था, अत: खत्तियों को राजा राजा करके तीसरा नाम ‘राजा’ पड़ा।
—स्रोत: त्रिपिटक-दीघ निकाय
6) बौद्ध ग्रंथ त्रिपिटक के दीघ निकाय के “महापरिनिब्बान सुत्त” में मोरियों (मौर्यों) को पिप्पलिवन का शासक तथा खत्तिय कुल का कहा गया है।
7) जैन व बौद्ध दोनों ही साक्ष्य “मौर्यों” को मोर (Peacock) से संबंधित करते हैं, जिसे इतिहासकारों व पुरातत्वविदों ने भी विश्वसनीय
माना है। इसी कारण मौर्य युग की कलाकृतियों में मोरों का प्रतिनिधित्व देखने को मिलता है। मौर्यकालीन सिक्कों पर मोर के चित्र मिलते हैं। इस मत की पुष्टि सम्राट अशोक की “लौरिया नन्दनगढ़ के स्तम्भ” के नीचे के भाग में उत्कीर्ण मोर की आकृति से भी हो जाती है।

सर्वप्रथम किसने बताया कि “मोर (Peacock)” मौर्यों का वंशीय/कुल चिह्न (Dynastic Emblem) था ~ ग्रुनवेडेल महोदय
9) तिपिटक (त्रिपिटक) के दीघ निकाय के महापरिनिब्बान सुत्त के अनुसार तथागत गोतम बुद्ध के महापरिनिब्बान (मृत्यु) के बाद पिप्पलिवन के मोरिय (मौर्य) भी अस्थियों के लिए पहुँचते हैं और कहते हैं —”भगवापि खत्तियो, मयम्पि खत्तिया”, मयम्पि अरहाम भगवतो सरीरानं भागं”. अर्थात भगवान बुद्ध भी खत्तिय (क्षत्रिय) थे और हम भी खत्तिय हैं, भगवान की अस्थि-धातु हमलोगों को भी मिलना चाहिए. पिप्पलिवन के मोरियों (मौर्य) के पहुँचने तक बुद्ध की अस्थियों का बँटवारा हो चुका था। देर से पहुँचने के कारण पिप्पलिवन के मोरियों को अंगारों (कोयलों/राख के ढेर) से ही संतोष करना पड़ा और उन्होनें अंगारों को लेकर अपने नगर पिप्पलिवन में एक स्तूप का निर्माण करवाया था। इस स्तूप का नाम अंगार स्तूप रखा गया था। ये तो था मोरिय गण (मौर्य गणराज्य) का त्रिपिटक में उल्लेख। इससे इतना तो तय है कि शुरू से ही मोरिय (मौर्य) तथागत भगवान बुद्ध के परम अनुयायी थे।
10) ‘मौर्य’ शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख कहा आया है —रूद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख में [मौर्य राज्ञ: चन्द्रगुप्तस्य और अशोकस्य मौर्यस्य (273-236 ईसा पूर्व) अर्थात मौर्य राजा चन्द्रगुप्त और अशोक मौर्य द्वारा सुदर्शन झील का निर्माण और उसमें से छोटी-बड़ी नालियाँ बनवाने का उल्लेख है। जैसाकि बताया जा चुका है कि पालि भाषा के ‘मोरिय’ का संस्कृत रूपांतरण है मौर्य ]। रूद्रदामन का जूनागढ़ अभिलेख संस्कृत भाषा का पहला अभिलेख है, जो शक राजा रूद्रदामन द्वारा लगभग 150 ईसवी में लिखवाया गया था। दिलचस्प बात यह है कि संस्कृत का यह पहला अभिलेख (150 ईसवी) उसी चट्टान पर लिखा है जिस पर सम्राट असोक का पहले से (273-236 ईसा पूर्व) प्राकृत-पालि भाषा में लिखा हुआ अभिलेख था। संस्कृत का दूसरा लंबा अभिलेख (200 ईसवी) भी प्रयाग के उसी लाट (स्तम्भ) पर लिखा है, जिस लाट पर सम्राट अशोक का पहले से प्राकृत-पालि भाषा में लिखा हुआ स्तंभलेख है।

इससे यह पुरातात्त्विक तौर पर भी 100% सिद्ध हो जाता है कि प्राकृत-पालि भाषा संस्कृत भाषा से प्राचीन है। पालि भाषा के मोरिय का संस्कृत रूपांतरण है मौर्य।
11) मौर्य साम्राज्य के संस्थापक और उनके पिता व माता का नाम ~ संस्थापक सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य, पिता का नाम -चन्द्रवर्द्धन मौर्य, माता का नाम -धम्ममोरिया
12) मौर्य साम्राज्य के तीसरे राजा ~ चक्रवर्ती सम्राट अशोक महान
13) सम्राट अशोक का जन्म ~ 304 ईसा पूर्व, चैत्र शुक्लपक्ष अष्टमी (अशोकाष्टमी कहते हैं)
14) अशोक के जन्म की तिथि किस ग्रंथ से लिया गया है ~ उत्तरविहारट्ठकथा, अशोकावदान
15) अशोक के पिता का नाम ~ बिन्दुसार मौर्य
16) अशोक की माँ का नाम ~ धम्मा मौर्य (धर्मा मौर्य)
17) वह वर्ष जब अशोक का राज्याभिषेक हुआ ~ 269 ईसा पूर्व
18) वह वर्ष जब सम्राट अशोक सिंहासनारूढ़ हुए ~ 273 ईसा पूर्व
19) वह अभिलेख जिसमें “असोक” नाम का उल्लेख है ~ मास्की, गुर्जरा, नेत्तुर और उड्गेलम
20) पुराणों में अशोक को कहा गया है ~ अशोकवर्द्धन
21) सम्राट अशोक ने अपनी किस पुत्री के साथ नेपाल का यात्रा किया और नेपाल में बुद्ध धम्म के प्रचार-प्रसार को गति प्रदान किया ~ पुत्री चारूमती के साथ
22) भारत में शिलालेखों का प्रचलन सर्वप्रथम
किसने किया ~ अशोक ने
23) कश्मीर का वह नगर जिसकी स्थापना
अशोक ने की थी ~ श्रीनगर
24) अशोक के कलिंग युद्ध का वर्ष था ~ 261 ईसा पूर्व
25) वह अभिलेख जिससे “कलिंग युद्ध” की
विस्तृत जानकारी मिलती है ~ 13 वाँ
26) वह अभिलेख जिससे यह ज्ञात होता है कि
कलिंग पर ‘नंदराज’ का शासन था ~ हाथी गुम्फा
27) कलिंग की राजधानी थी ~ तोशली
28) वह युद्ध जिसके बाद अशोक ने धम्मघोष अपना लिया ~ कलिंग युद्ध
29) वह जानवर जिसके लिए कलिंग प्रसिद्ध था ~ हाथी
30) अशोक ने अपने अभिलेखों में किस लिपि का प्रयोग किया ~ ब्राह्मी, खरोष्ठी, ग्रीक, आरमाइक
31) अशोक के अभिलेखों को पढ़ने में सबसे पहले सफलता किसे मिली ~1837 में, जेम्स प्रिंसेप
32) कलिंग युद्ध का वर्णन व अशोक के हृदय
परिवर्तन की बात किस शिलालेख में मिली ~13 वाँ शिलालेख
33) अशोक ने अपने राज्याभिषेक के कितने वर्ष
में कलिंग पर विजय किया ~ 8वें वर्ष
34) वह अभिलेख जिससे मौर्यकालीन कर
नीति की स्पष्ट जानकारी मिलती है ~ रूम्मिनदेई
35) वह धम्म जिसे अशोक ने कलिंग विजय के बाद पूर्णरूपेण अपना लिया ~ बुद्ध धम्म
36) वह व्यक्ति जिसके प्रभाव में आकर अशोक
बुद्ध धम्म ग्रहण किये ~ निग्रोध
37) अशोक को बुद्ध धम्म में विधिवत दीक्षित किया था ~ उपगुप्त नामक बौद्ध भिक्षु
38) अशोक पूर्णरूपेण बौद्ध बन गये ~ मोग्गलिपुत्त तिस्स के प्रभाव से
39) अभिलेखों में “देवानंप्रिय” तथा “प्रियदर्शी”
किसे कहा गया है ~ अशोक को
40) किस अभिलेख से अशोक को पहचाना गया ~ मास्की
41) अशोक ने बुद्ध धम्म के प्रचार के लिए श्रीलंका में किसे भेजा ~ अपने पुत्र महिन्द व पुत्री संघमित्रा को
42) बिंदुसार के समय अवन्ति (उज्जयिनी) के गवर्नर थे ~ अशोक
43) अशोक के गांधार एवं लद्यमान के लेख
किस लिपि में हैं ~ आरमाइक
44) अशोक के अभिलेखों को कितने भागों में
बाँटा गया है ~ तीन (शिलालेख, स्तंभलेख, गुहालेख )
45) अशोक की पत्नियों के नाम ~ वेदिश महादेवी शाक्यकुमारी (शाक्यानी या देवी भी कहा जाता है), कालुवाकी, पद्मावती, असंधिमित्रा, तिष्यरक्षिता
46) कौशाम्बी अभिलेख को कहा जाता है ~ रानी का अभिलेख
47) अपने राज्याभिषेक के 10वें वर्ष अशोक ने
यात्रा किया था ~ शाक्यमुनि बुद्ध के ज्ञान प्राप्ति स्थल बोधगया
48) अपने राज्याभिषेक के 14वें वर्ष अशोक ने
यात्रा किया ~ निग्लिवा (निगाली सागर), नेपाल
49) अपने राज्याभिषेक के 20वें वर्ष अशोक ने
यात्रा किया ~ शाक्यमुनि बुद्ध के जन्म स्थली लुम्बिनी
50) 84 हजार स्तूपों का निर्माता कहा जाता है ~ अशोक को
51) वह शिलालेख जिसमें “अशोक के व्यक्तिगत धर्म, बुद्ध धम्म” का उल्लेख है ~ भाब्रू शिलालेख, वैरट (राजस्थान)
52) अशोक के अधिकतर अभिलेख किस लिपि
में हैं ~ धम्म लिपि (वर्तमान में ब्राह्मी लिपि के नाम से जाना जा रहा है)
53) भारतीय इतिहास का पहला शासक जिसने अकारण हिंसा के त्याग का सिद्धांत प्रस्तुत किया ~अशोक
54) अशोक का बुद्ध धम्म, राजधर्म था, यह कथन है ~ डी. आर. भण्डारकर
55) अशोक का धम्म, उपासक बुद्ध धम्म था यह कथन है ~ डी. आर. भण्डारकर
56) किस इतिहासकार ने केवल अभिलेखों के आधार पर ही अशोक का इतिहास लिखने का प्रयास किया है ~ डी. आर. भण्डारकर
57) किसने अशोक के धम्म का मूल श्रोत बुद्ध धम्म बताया है ~ डी. आर. भण्डारकर
58) वह स्थान जहाँ अशोक द्वारा सम्वर्द्धित ‘कोणागमन बुद्ध (कनकमुनि बुद्ध)’ का स्तूप है ~ निग्लीवा, नेपाल
59) वह पदाधिकारी जिसे अशोक ने अपने राज्याभिषेक के 13वें वर्ष धम्म के प्रचार के लिए नियुक्त किया था ~ धम्म महामात्र
60) वह विदेशी शासक जिसने अशोक का अनुकरण करते हुए देवानंप्रिय की उपाधि धारण की ~ लंका नरेश तिस्स
61) अशोक ने कुल कितने वर्ष शासन किया ~ 37 वर्ष
62) नेपाल स्थित वह नगर जिसकी स्थापना अशोक ने की थी ~ देवपाटन
63) बिहार स्थित बराबर पहाड़ी की गुफाओं का निर्माण आजीवकों के लिए करवाया था ~ अशोक
64) “जीओ और जीने दो” किस राजा का कथन है ~ अशोक
65) “सर्व लोकहित से बढ़कर दूसरा कोई कार्य नहीं”, किस राजा का कथन है ~ अशोक
66) “राजनीतिक हिंसा धर्म विरूद्ध है” कथन है ~ अशोक
67) “वसुधैव कुटुम्बकम” के जनक थे ~ चक्रवर्ती सम्राट अशोक महान
68) अशोक की राष्ट्रीय भाषा एवं लिपि थी ~
पालि एवं धम्म लिपि
69) अशोक के दिल्ली टोपरा अभिलेख को दिल्ली ले जाने वाला शासक था ~ फिरोज तुगलक
70) खरोष्ठी लिपि लिखी जाती थी ~ दायें से बायें
71) अशोक की तीर्थ यात्राओं का वर्णन मिलता है ~ 7वें एवं 8वें शिलालेख में
72) अशोक की राजकीय घोषणा वाले स्तंभ को कहा जाता है ~ लघुस्तंभ लेख
73) अशोक द्वारा प्रसारित अंतिम शिलालेख है ~ 7वाँ
74) अशोक का वह अभिलेख जो द्विभाषीय (युनानी + आरमाइक) है, पाया गया है ~ शार -ए-कुना (कन्दहार) से
75) वह शिलालेख जिसमें पशुबलि की निंदा है ~ प्रथम शिलालेख
76) अशोक के अभिलेखों से ज्ञात प्रांतों की संख्या है ~ पाँच
77) अशोक का जन्म कहाँ हुआ था ~ पाटलिपुत्र
78) सारनाथ स्तंभ का निर्माण किया था ~ अशोक ने
79) सांची का स्तूप किसने बनवाया ~ अशोक ने
80) “तृतीय बौद्ध संगीति” किसके शासनकाल में हुआ ~ अशोक के
81) किस स्रोत में अशोक के राज्यकाल में “तृतीय बौद्ध संगीति” होने का उल्लेख मिलता है ~ दीपवंश और महावंश
82) “तृतीय बौद्ध संगीति” के अध्यक्ष ~ महाथेर मोगलिपुत्त तिस्स
83) “तृतीय बौद्ध संगीति” कहाँ हुआ था ~पाटलिपुत्र स्थित असोकाराम विहार
84) अशोक के पुत्र एवं पुत्रियों के नाम ~
• पुत्रियाँ : संघमित्रा, चारूमती
• पुत्र : महिन्द, तिवल, कुणाल, जल्लोक,
85) अशोक द्वारा “बुद्ध धम्म” के प्रचार के लिए अन्य देशों में भेजे गये बौद्ध भिक्षु ~
• मज्झन्तिक ~ कश्मीर तथा गंधार
• महारक्षित ~ यवन देश
• मज्झिम ~ हिमालय देश
• धर्मरक्षित ~ अपरांतक
• महाधर्मरक्षित ~ महाराष्ट्र
• महादेव ~ महिषमंडल (मैसूर या मान्धाता)
• रक्षित ~ बनवासी (उत्तरी कन्नड़)
• सोन तथा उत्तर ~ सुवर्णभूमि
• महिन्द व संघमित्रा ~ श्रीलंका
86) अन्य देशों व राजाओं का नाम जहाँ अशोक द्वारा “बुद्ध धम्म” के प्रचार के लिए भेजे गये धम्मदूत ~
• अन्तियोकस ~ सीरियाई राजा
• तुरमय ~ मिस्री राजा
• अन्तिकिनि ~ मेसोडोनियन राजा
• मग ~ एपिस
• अलिक सुंदर ~ सिरीन
87) मौर्य साम्राज्य के दस राजाओं के नाम ~
• चक्रवर्ती सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य
• सम्राट बिंदुसार मौर्य
• चक्रवर्ती सम्राट अशोक महान
• सम्राट कुणाल मौर्य
• सम्राट दशरथ मौर्य
• सम्राट सम्प्रति मौर्य
• सम्राट शालिसुक मौर्य
• सम्राट देववर्मन
• सम्राट शतधन्वन मौर्य
• सम्राट बृहद्रथ मौर्य
88) “मोरियवंस (मौर्य-वंश)” किस वंश की उपशाखा है ~ (सक्यवंस) शाक्य-वंश
89) किस स्थान से अशोक के शिलालेखों के लिए पत्थर लिया जाता था ~ चुनार, मिर्ज़ापुर से बलुआ पत्थर
90) किस शिलालेख में अशोक ने घोषणा की है “सभी मनुष्य मेरे बच्चे हैं” ~ प्रथम पृथक शिलालेख
91) अशोक का शासनकाल ~ 273- 236 ईसा पूर्व (37 वर्ष )
92) अशोक कालीन वह पत्थर जो एक ही पत्थर को तराशकर बनाया जाता था, कहलाता है ~ एकाश्मक
93) वह मौर्य शासक जिसने हिंसक मनोरंजन के साधनों पर प्रतिबंध लगाया ~ अशोक
94) अशोक ने भगवान बुद्ध की शिक्षाओं को सर्वसाधारण की समझ में आने वाली जन भाषा में लिखवाया था. जिसे इतिहासकारों द्वारा “अशोक का धम्म” कहा गया है. वे शिक्षाएँ हैं ~
“अपासिनवे बहुकयाने दया दाने सचे सोचये मादवे साधवे च” अर्थात…..
• अल्प पाप (अपासिनवे)
• अत्यधिक कल्याण (बहुकयाने)
• दया और दान (दया दाने)
• सत्यवादिता (सचे)
• पवित्रता (सोचये)
• मृदुता (मादवे)
• साधुता (साधवे)
• इत्यादि (च)
ही ”अशोक का धम्म” है.
95) भारत का राष्ट्रीय चिह्न ~अशोक स्तम्भ शीर्ष, सारनाथ (उ. प्र.) में स्थित मौर्यकालीन अशोक स्तम्भ से.
96) भारत के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे में स्थापित चक्र ~ सारनाथ में स्थित मौर्यकालीन अशोक स्तम्भ से
97) वीरता पुरस्कार “अशोक चक्र” दिया जाता है ~ सम्राट अशोक के स्मृति स्वरूप
98) जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र और जनगणना की धारणा लिया गया है ~ मौर्यकाल से
99) मौर्य साम्राज्य के तीसरे शासक सम्राट असोक ने जिस लिपि का प्रयोग अपने अभिलेखों में किया है; उसे कहा है ~धम्म लिपि, जो आज ब्राह्मी लिपि के नाम से प्रचलित है.
100) अब तक ज्ञात इतिहास के अनुसार सम्राट अशोक ने कितने प्रकार के स्तम्भों का निर्माण करवाया था ~ 6 प्रकार के स्तम्भ
• गज स्तम्भ
• अश्व स्तम्भ
• वृषभ (साँढ़) स्तम्भ
• एकमुखी सिंह स्तम्भ
• चौमुखी सिंह स्तम्भ
• धम्म-चक्र स्तम्भ

सम्राट अशोक बौद्ध महासंघ
भवतु सब्ब मंगलं!
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“जो इतिहास बनाना चाहते हैं उन्हें अपने इतिहास को वास्तविक रूप में जानना आवश्यक है।”…
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पाली में तण्हा का जो अर्थ है वह सँस्कृत में नहीं।तण्हा को सँस्कृत में तृष्णा(इच्छा) से replace किया जाता है। जबकि दोनो के अर्थ अलग हैं। तण्हा* (libido)
भगवांबुद्धने धम्म को सुआख्यात किया है !
सील समाधि पञ्ञा ! (शील समाधी प्रज्ञा ) पर स्वयं दु:ख भव मुक्ति का मग्ग को खोज निकाला उस पर स्वयम् चले और दुसरों को *सद्धम्म पथ *(=सद्धर्म Good Phenomena Path) चलने के लिए मार्गदर्शन किया है !
1) कामभव
( #sensual pleasure abode ,छः इन्द्रियों का मजा अथवा दुख वाले निवास ) की तण्हा
2) रूपभव ( #fine metrial abode , अस्थूल शरीर काय ), की तण्हा
3) अरूपभव (#immaterial abode , शरीर-रहित अवस्था) की तण्हा
काम भव तण्हा ,रूप भव तण्हा , अरूप भव तण्हा,
यह तीन तण्हा संखा़र है
काम तण्हा , भव तण्हा और विभव तण्हा को ही विनम्रतापूर्वक समझाया गया है। अनुक्रम से काम तण्हा रूप तण्हा , अरूप तण्हा यह सभी शब्द संस्कारित संस्कृत शब्द नहीं है, महातण्हासंखय-सुत्त है जिसको संस्कारित किया गया है, महातृष्णासंस्कार सुत्त में
भन्ते विमल तिस्स टिप्पणी:
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बुद्ध वचन मे तण्हा का निहितार्थ बहुत गहरा व विस्तृत है। सँस्कृति मे तृष्णा अधिकतम रूप से तण्हा का भाव समेटती है। हिन्दी मे बहुत अल्प भावार्थ है। आँग्ल भाषा तो बहुत ही बौनी है..उसमें सामर्थ्य ही नहीं है कि वह तण्हा… संक्खारा…निब्बान.. आदि पाली शब्दों के भावार्थों को व्यक्त कर सके…। मँगल हो
तमिलनाडु का काँचीपुरम किसी जमाने में बड़ा बौद्ध केंद्र था। बुद्धिज्म के बड़े-बड़े स्काॅलर यहाँ से जुड़े थे।
बोधिधर्म काँची के थे। वे जेन बुद्धिज्म के संस्थापक थे। बुद्धिस्ट तर्कशास्त्री दिङ्नाग काँची के थे। नालंदा विहार के कुलपति धर्मपाल ने भी काँची में शिक्षा प्राप्त की थी। बुद्धघोष ने काँची के विहार में वर्षावास किए थे। तमिल के प्राचीन काव्य – ग्रंथ मणिमेकलई और शिलप्पदिकारम भी काँची को बौद्ध केंद्र होने का सबूत देते हैं। सातवीं सदी में ह्वेनसांग काँचीपुरम आए, लिखे कि यहाँ सैकड़ों बौद्ध विहार हैं, 10, 000 बौद्ध भिक्खु हैं, अशोक के बनवाए 100 फीट ऊँचा स्तूप है। बिहार के कुर्कीहार की खुदाई में जो बौद्ध मूर्तियाँ मिली हैं, उन पर अभिलेख हैं, अभिलेख बताते हैं कि अनेक बुद्ध मूर्तियाँ काँची के लोगों ने दान किए थे। मूर्तियाँ पाल कालीन हैं। तेरहवीं सदी के यूरोपीय यात्री मार्कोपोलो ने काँची के निकट महाबलिपुरम में सप्त पैगोडा ( चैत्य ) देखे थे। 14 वीं सदी में जावा के कवि ने भी काँची में 13 बौद्ध मठ होने का जिक्र किए हैं। 14 वीं सदी के एक कोरियाई अभिलेख में लिखा है कि 1370 में एक बुद्धिस्ट ध्यानभद्र काँची से कोरिया गए थे और वहाँ जाकर उन्होंने एक महायान बौद्ध मठ स्थापित किए। अभिलेख में यह भी है कि उन्होंने धम्म सुत्त की शिक्षा काँची में प्राप्त की थी। आज काँची बौद्ध केंद्र नहीं रहा। मगर बौद्ध मूर्तियाँ – स्तंभ – प्रतीक आदि काँची में मिलते हैं। तस्वीरें काँची की हैं।