*सबसे बड़ा दान *

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कई दिनों के विहार के बाद भगवान् बुद्ध मगध की राजधानी राजगृह से प्रस्थान करने वाले थे। लोगों को जब यह पता चला तो वे उनके लिए भेंट आदि लेकर उनके दर्शनों के लिए आने लगे।

अपने शिष्यों के साथ बैठे हुए बुद्ध लोगों की भेंट स्वीकार कर रहे थे। सम्राट बिम्बसार ने उन्हें भूमि, खाद्य, वस्त्र, वाहन आदि प्रदान किए। नगर सेठों ने भी धन-धान्य और सुवर्ण आभूषण उनके चरणों में अर्पित कर दिए। सभी के दान को स्वीकार करने के लिए बुद्ध अपना दायां हाथ उठा कर स्वीकृति इंगित कर देते थे।

भीड़ में एक वृद्धा भी थी। वह बुद्ध से बोली – “भगवन, मैं बहुत निर्धन हूँ। मेरे पास आपको देने के लिए कुछ भी नहीं है। आज मुझे पेड़ से एक आम गिरा हुआ मिल गया। मैं उसे खा रही थी तभी मैंने आपके प्रस्थान करने का समाचार सुना। उस समय तक मैं आधा आम खा चुकी थी। मैं भी आपको कुछ अर्पित करना चाहती हूँ लेकिन मेरे पास इस आधे खाए हुए आम के सिवा कुछ भी नहीं है। इसे ही मैं आपको भेंट करना चाहती हूँ। कृपया मेरी भेंट स्वीकार करें।”

वहां उपस्थित अपार जनसमुदाय, राजा-महाराजाओं और सेठों ने देखा कि भगवान बुद्ध अपने आसन से उठकर नीचे आए और उन्होंने दोनों हाथ फैलाकर वृद्धा का आधा आम स्वीकार किया।

सम्राट बिम्बसार ने चकित होकर बुद्ध से पूछा – “भगवन, एक से बढ़कर एक अनुपम और बहुमूल्य उपहार तो आपने केवल हाथ हिलाकर ही स्वीकार कर लिए लेकिन इस बुढ़िया के जूठे आम को लेने के लिए आप आसन से नीचे उतरकर आ गए! इसमें ऐसी कौन सी विशेषता है?”

बुद्ध मुस्कुराकर बोले – “इस वृद्धा ने मुझे अपनी समस्त पूँजी दे दी है। आप लोगों ने मुझे जो कुछ भी दिया है वह तो आपकी संपत्ति का कुछ अंश ही है और उसके बदले में आपने दान करने का अंहकार भी अपने मन में रखा है। इस वृद्धा ने मेरे प्रति अपार प्रेम और श्रद्धा रखते हुए मुझे सर्वस्व अर्पित कर दिया है फ़िर भी उसके मुख पर कितनी नम्रता और करुणा है।”

‘मणीमेक्खलाई’ प्रसिद्ध तामिळ बौद्ध महाकाव्य

तामीळ साहित्यात पाच महाकाव्ये प्रसिद्ध आहेत. व ती खालीलप्रमाणे आहेत.
१) सिलप्पाधीकरम
२) मणीमेक्खलाई
३) वलाईयापती
४) कुंडलकेसी
५) जिवका चिंतामणी.

आश्चर्याची गोष्ट म्हणजे ही महाकाव्ये एकाही हिंदू तामिळ कवीनीं लिहिलेली नाहीत.पहिली आणि शेवटची कलाकृती जैन धर्मीय कवींची असून मधली तिन्ही महाकाव्ये बौद्ध धर्मीय कवींची आहेत. यातील जैन कलाकृती अद्याप उपलब्ध असून बौद्ध कलाकृतीतील ‘मणीमेक्खलाई’ सोडून बाकीच्या कलाकृती नष्ट झालेल्या आहेत. ‘मणीमेक्खला’ या महाकाव्याबाबत पालि, संस्कृत आणि सिंहली साहित्य जरी अनभिज्ञ असले तरी बुद्ध तत्वज्ञानाचा खजिना असलेले हे तामिळ साहित्यातील लेणे एका सुंदर कथेद्वारे सांगण्यात आले आहे. सहाव्या शतकातील दक्षिण भारतातील बौद्ध संस्कृतीचा सुवर्णकाळ हे काव्य स्पष्ट करते.

मनिमेक्खलाई ही एक हिंदू कुमारिका आहे आणि ती हिंदू तत्वज्ञानाचा त्याचबरोबर इतर धर्मांचाही अभ्यास करत आहे. अभ्यास करता करता ती बौद्ध तत्त्वज्ञानाची इतर धर्मांबरोबर तुलना करू लागते आणि मग तिला धम्माच्या बऱ्याच गोष्टी परखड व सत्य वाटू वाटतात. जन्मापासून मनुष्य हा दुःखी आहे आणि तो सतत त्या पासून दूर पळण्याचा प्रयत्न करतो आहे. पण मार्ग माहीत नसल्याने चुकीची कर्मकांडे करीत आहे. हे तिला उमगल्यावर ती भिक्खु अरवना अडिगल यांचे प्रवचन ऐकते. सत्य मार्ग कळल्यावर ती भिक्खूणीची उपसंपदा घेते आणि उर्वरित आयुष्य दक्षिण भारतात बौद्ध धर्माचा प्रसार करण्यात घालवीते. अशी ही मणीमेक्खला महाकाव्याची थोडक्यात कथा आहे.

अशा या महाकाव्यात चार आर्यसत्ये, प्रतीत्यसमुत्पाद, नाम-रूप, चित्त आणि चेतासिका ( Mind & Mental states ), शील-समाधि-प्रज्ञा यांचे चांगले स्पष्टीकरण केलेले आहे. या महाकाव्याच्या कवीने बौद्ध धर्माची इतर धर्माबरोबर तुलना करून सत्य काय व योग्य काय हे कथेद्वारे व योग्य मीमांसा करून मांडलेले आहे. यामुळे या काव्याचा हेतू बौद्ध धम्माचा प्रसार करणे हाच दिसून येतो. आणि तो शतप्रतिशत यशस्वी झालेला आहे. या महाकाव्यात एकूण ३० सर्ग (अध्याय) असून दक्षिण भारतातील प्राचीन बौद्ध संस्कृतीचा अभ्यास करणाऱ्या सर्व विद्यार्थ्यांसाठी हे काव्य अनमोल आहे. प्राचीन काळी बहरलेल्या बौद्ध संस्कृतीची खाण या काव्यातून दिसून येते. अशा या पुरातन तामिळी साहित्यातील महाकाव्याचा बौद्ध भाट/कवी आहे ‘सीथालाई सत्तनार’. त्यांच्या या कलाकृतीस अभिवादन. एक प्रश्न पडतो की महाराष्ट्र देशी हरेक ठिकाणी, डोंगर-दऱ्यात अनेक लेण्या आहेत. एकेकाळी इथेही बौद्ध संस्कृती रुजली होती. बहरली होती. मग तामिळ साहित्यासारखे येथे ‘मणीमेक्खलाई’ महाकाव्य किंवा एखादा ग्रंथ का निर्माण झाला नाही ?

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#आखिर_कार_जित_गया_लदाख

अलेक्जेंडर एडमिलर मेगास्थनीज़ फिलनि एल्डर दोहराते है के एक जमाने मे लदाख सोने का बहुत बड़ा उत्पादक हुवा करता था बल्टीस्थान और लदाख की धरती सोने की बड़ी उत्पादक ओर सुने के धुलाई के लिए प्रसिद्ध थी चीनी-तीर्थयात्री भिक्षु, जुआनजांग, सी। 634 कहते है यह एक #सुवर्ण_भूमि के नाम से जाना जाते थी जिसे लदाखी मो लो टो कहते है 7 वी शतब्दी भारत मे लदाख को झांगजुंग नामसे बी जाना जाता है 634 में लदाख ने तिबिटी सुजेरनीति को स्वीकार किया फिर लदाख पर तिबित राज्य परस्तापि किया गया 665 में लदाख पर तिबित का पूर्ण रूप से शासन स्तापित होगया फिर 671 में एक छोटासा विद्रोह हुवा जो असफल हुवा था 731 में तिबित ने गिलगित पर आक्रमण कर आपना राज्य स्थापित किया 842 में तिबित शासन टूटने के बाद तिब्बत के राजा ने लदाख राजवंश की स्थापना की न्यामी गोन इनके नेतत्व में पहिला लदाखी राजवंश की स्थापना की लदाख में बौद्ध धर्म के आने के पहिले बोर्न धर्म था फिर बौद्ध धर्म का प्रचार हुवा लदाख का प्राचीन इतिहास बड़ा यह एक उसका छोटा आंश है एक समय मे पवित्र ओर सुवर्ण भूमि कहने वाला लदाख आधुनिक युग मे इतना बर्बर किउ हुवा तो 1947 में हुवे विलय के कारण लदाखि जनता अपना स्वतंत्र राज्य भारत मे चाहती थी जो जम्मु कश्मीर से अलग हो मगर तब के शासकों ने इस बात को नजर अंदाज किया और हजारो लदाखी नागरिकों को कश्मीरी लोगो का गुलाम किया कश्मीर यह एक आतंकवाद से भरा हुवा प्रदेश उसके वजहा से लदाख में विकास नही हो पारा था और यह #धारा370 जो लदाख को अन्य भारत से तोड़ रही थी पर्यटन से भरपूर यह प्रदेश राजनीतिक गलतियो से पिछड़ा था लदाख के सर्वउच्छ धर्म गुरु रिनपुछे कुशल बकूला द्वारा लदाख स्वतंत्र राज्य की मांग होती रही है मगर उनको बी नजरअंदाज किया गया अभी के केंद्र सरकार ने जो फैसला लिया है वे एक महत्वपूर्ण काम है इस से उन हजारो लदाखिओ को आझादी ओर न्याय मिला जो विनाकारन आतंकवाद से पिछड़े रहे थे आब लदाख आपनी सांस्कृतिक राजनेतिक आझादी में है लदाखि लोगो को ढेर सारी बधाई हो

बोधिवृक्ष पूजन :बुद्ध गया स्तंभ !

लंदन के विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूज़ियम में रखा हुआ है ये स्तंभ…. स्तंभ भारत की बौद्ध संस्कृति के प्रेरणा स्थल बुद्ध गया के उत्खनन से प्राप्त हुआ है… ये स्तंभ कुषाण कालीन है। समय पहली सदी ईस्वी … प्राचीन बुद्ध संस्कृति के पाषाण स्तंभ के तीनों भागों पर शिल्पकला दिखाई पड़ती है…


ये स्तंभ कुषाण कालीन है। समय पहली सदी ईस्वी … प्राचीन बुद्ध संस्कृति के पाषाण स्तंभ के तीनों भागों पर शिल्पकला दिखाई पड़ती है… इस स्तंभ के बिल्कुल ऊपरी भाग पर बुद्ध धम्मीय उपासक बोधिवृक्ष का पूजन करते हुए दिखाई देते हैं… इस स्तंभ के निचले भाग की ओर बुद्ध उपासक का नाम शिल्प पर खुदा हुआ है। उस उपासक के शिल्प के आसपास आज के तरह की फ़ोटो फ्रेमिंग भी की गई है… सबसे महत्वपूर्ण इस स्तंभ के बीचोंबीच एक शिलालेख है…

इस शिलालेख का वाचन आदरणीय अशोक नगरे सर ने किया है, इसे पढ़ते हुए एक दिक्कत इस तरह आयीं कि शिलालेख के एक भाग की एक बड़ी सी छिलपी निकली हुई थी… तब भी शिलालेख का वाचन उन्होंने किया लिखा था —— “अयाये कुरंगिये दानं ” अर्थात —-“आर्या कुरंगि का दान ” आर्या, ये आदरसूचक संबोधन है। स्तंभ का धम्मदान करने वाली उपासिका स्त्री का नाम कुरंगी है…

विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूज़ियम में इस स्तम्भ की जानकारी तो दी गई है लेकिन इस शिलालेख का कहीं कोई उल्लेख नहीं है…. आदरणीय अशोक नगरे सर के शिलालेख वाचन से, ईसा की पहली सदी में बुद्ध गया में धम्मदान करने वाली एक उपासिका प्रकाश में आयीं। बुद्ध गया में उस सदी में धम्मदान करने वाली आदरणीय “आर्या कुरंगी “को शतशः वंदन !

‘अत्तदीपा विहरथ अत्त सरणा’ ——–

महापरिनिब्बान सुत्त में आए भगवान बुद्ध के इस अंतिम सन्देश- ‘अत्तदीपा विहरथ अत्त सरणा’ का अर्थ पालि प्रोफ़ेसर संघसेन सिंह के अनुसार, कुछ विद्वान ‘अपना दीपक आप बनो’ करते हैं जबकि पूरे ति-पिटक में ‘दीप’ शब्द द्वीप के अर्थ में प्रयुक्त है और ‘पदीप’ शब्द दीपक या चिराग के अर्थ में। धम्मपद में ‘पदीप’(गाथा संख्या 146) और ‘दीप’(गाथा संख्या 25); दोनों शब्दों का प्रयोग हुआ है। ‘अत्तदीपो विहरथ अत्त सरणा’ का यहां अर्थ है- अपना द्वीप आप स्वयं बन कर विहार करें। ‘अपना प्रकाश आप’ की अवधारणा पूरे ति-पिटक में कहीं नहीं है (‘प्राक्कथन’ धम्मपदः गाथा और कथा, पृ. 16 )।

👉 निरर्थक चर्चा अधर्म हैं 👈 ☸ शील,समाधि,प्रज्ञा धम्म है ☸

प्राचीनकाल से आत्मा और विश्व का आरंभ की निरर्थक चर्चा चली आ रही हैं।

ऐसी उद्देश्यहीन चर्चा मानव समाज के लिए कल्याणकारी नहीं अपितु निरर्थक है।

तथागत बुद्ध के अनुसार भूतकाल में आचार्य आत्मा के बारे में या स्वयं के बारे में कुछ प्रश्न उठाते थे।

वे पूछते थे _

1) क्या मैं पहले था ?
2) क्या मैं पहले नहीं था ?
3) उस समय मैं क्या था?
4) मैं क्या होकर क्या हुआ ?5) क्या मैं भविष्य में होऊंगा ?
6) क्या मैं भविष्य में नहीं होऊंगा ?
7) तब मैं क्या होऊंगा ?

😎

तब मैं कैसे होऊंगा ?
9) मैं क्या होकर क्या होऊंगा ?

या फिर वह अपने वर्तमान के विषय में संदेहशील होते थे –

1) क्या मैं हूँ ?
2) क्या मैं नही हूँ ?
3) मैं हूँ क्या ?
4) मैं कैसे हूँ ?
5) यह प्राणी कहां से आया हैं ?
6) यह किधर जायेगा?

दूसरों ने विश्व के आरंभ के विषय में प्रश्न पूछे।

विश्व को किसने पैदा किया?क्या संसार अनंत हैं?
जो शरीर हैं, वही जीव हैं ?शरीर अन्य हैं, जीव अन्य हैं ?

ऐसे प्रश्न और ऐसी चर्चा निरर्थक हैं। इनसे किसीका भी का कोई कल्याण होने वाला नहीं हैं।

आज के वैज्ञानिक युग में भी अधर्मी लोग इन निरर्थक प्रश्नो में भोली-भाली जनता को उलझाए रखते है और उनका शोषण करते है।

मनुष्य के कल्याण के लिए,सुख व शान्ति के लिए आवश्यक है सदाचार का जीवन।

अधर्मी और पाखंडी धर्म के ठेकेदार समाज को काल्पनिक आत्मा और परमात्मा को ढूंढने के लिए ललचाते है। जो नहीं है वह भला कहाँ से मिले? इसलिए अधर्मी ठेकेदार बार बार काल्पनिक कहानी बनाकर, बदलकर लोगों को बेवकूफ बनाते है। इसलिए सावधान होना ज़रूरी है।

मनुष्य के सुख के लिए शील, समाधि और प्रज्ञा ही उत्तम मार्ग है।

नमो बुद्धाय

🙏
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भारिप-बमसं ‘वंचित’मध्ये विसर्जित

Sarkarnama

लोकसभा व विधानसभा निवडणुकीत भक्कम जनाधार मिळवणाऱ्या वंचित बहुजन आघाडीमध्ये भारिप-बहुजन महासंघाला विसर्जित करण्यात आले आहे. यासंबंधिचा निर्णय मुंबई येथील डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर भवन दादर येथे शुक्रवारी (ता. ८) पार पडलेल्या प्रदेश, विभागीय, जिल्हा कार्यकारिणीतील पदाधिकाऱ्यांच्या बैठक घेण्यात आला.

अकोला – लोकसभा व विधानसभा निवडणुकीत भक्कम जनाधार मिळवणाऱ्या वंचित बहुजन आघाडीमध्ये भारिप-बहुजन महासंघाला विसर्जित करण्यात आले आहे. यासंबंधिचा निर्णय मुंबई येथील डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर भवन दादर येथे शुक्रवारी (ता. ८) पार पडलेल्या प्रदेश, विभागीय, जिल्हा कार्यकारिणीतील पदाधिकाऱ्यांच्या बैठक घेण्यात आला.

विशेष म्हणजे भारिप-बहुजन महासंघ वंचित बहुजन आघाडीत विलीन होणार असल्याचे भाकीत ‘सकाळ’ने २ नोव्हेंबरच्या अंकातच व्यक्त केले होते.

लोकसभा निवडणुकीपूर्वी अॅड. प्रकाश आंबेडकर यांनी राज्यात वंचित बहुजन आघाडीची घोषणा केली होती.

राज्याच्या राजकारणात तिसरा पर्याय उभा करण्याचा प्रयत्न या माध्यमातून झाला. सर्व जागांवर निवडणूक लढवित ४२ लाखांवर मतंही वंचित बहुजन आघाडीने घेतली. एकही खासदार निवडून आला नसला तरी मिळालेल्या मतांनी आत्मविश्‍वास वाढलेल्या ‘वंचित’ने विधानसभा निवडणूक स्वबळावर लढविण्याचा निर्णय घेतला.

दरम्यानच्या काळात वंचितमधील एक-एक तारा गळत गेला. परिणामी विधानसभा निवडणुकीत पाटी कोरी राहली. त्यातच लोकसभेच्या तुलनेत मतही घटले. असे असले तरी भारिप-बमसंच्या तुलनेत वंचित बहुजन आघाडीने अकोला जिल्ह्याच्या सीमा ओलांडत राज्यात तिसरा पर्याय उभा करण्याची क्षमता असल्याचे दाखवून दिले. त्यामुळे भारिप-बमसं वंचित बहुजन आघाडीमध्ये विसर्जन करण्यात आला.

शुक्रवारी (ता. ८) मुंबई येथे वंचित, भारिपच्या प्रदेश, विभागीय, जिल्हा कार्यकारिणीतील पदाधिकाऱ्यांच्या बैठकीत प्रकाश आंबेडकर यांनी यासंबंधी घोषणा केली. बैठकीत डॉ. अरुण सावंत, अशोक सोनोने, रेखा ठाकूर, राजेंद्र पातोडे, धनराज वंजारी, माजी आमदार बळीराम सिरस्कार, धैर्यवर्धन पुंडकर, अरुंधती सिरसाट व जवळपास १५ हजार कार्यकर्ता उपस्थित होते.

वंचितच्या कार्यकारिणात होणार बदल
भरिप-बहुजन महासंघ वंचित बहुजन आघाडीमध्ये विलीन झाल्यानंतर वंचित बहुजन आघाडीच्या कार्यकारिणीमध्ये बदल करण्यात येईल. काही ठिकाणी हा बदल अंशतः तर काही ठिकाणी पूर्णतः असेल. भारिप-बमसं वंचितमध्ये विसर्जित झाल्यानंतर आता भारिप-बमसंच्या सर्व कार्यकारिण्या बरखास्त झाल्याची घोषणासुद्धा मुंबई येथे पार पडलेल्या सभेत करण्यात आली.

☸धम्मपद☸ 🌷बालवग्गो🌷 ▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬ ★•┈┈┈┈┈•✦𖤓✦•┈┈┈┈┈•★

गाथाः चरन्ति बाला दुम्मेधा, अमित्तेनेव अत्तना। करोन्ता पापकं कम्मं,यं होति कटुकप्फलं ।।

अर्थःदुष्ट बुद्धि वाले व्यक्ति स्वयं ही अपने शत्रु हैं।वे अपने ही शत्रु बनकर घूमते रहते हैं और पापमय (अकुशल )कर्म करते रहते हैं। उन पापमय (अकुशल) कर्मों का कडूआ फल मिलना सुनिश्चित है।

स्पष्टीकरण

जीस वैक्ती के मन मे दुसरो के प्रति द्वेष होता है
उसकी बुद्धी दृष्ट प्रवृत्ती की होती है तो

व्ह वैक्ती आपणे विनाश का स्वयं ही कारण है
निसर्गका नियम है जो आदमी कर्म करता है उसका फल आवश्यक मिलता है

कर्म करणे वाले पर निर्भर है वे कैसा कर्म करे
हम हमेशा छोटी चीजो को नजर अंदाज करते है

ओर अकुशल कर्म करने को नही डरते मगर इसका जब फल मिलता है तो तब हम विचलित हो जाते है

इसी लिए हमारे अकुशल कर्म ही हमारे शत्रु है
बुद्ध का धम्म एक मानव केन्द्री धम्म है जो

स्वयं पर केन्दित है वे खुद के उद्धार की बात करता है आपने विनाश का कारन हम खुद है और आपने गति का

कारण बी हम खुद है जो कर्म करोगे उसका फल तो आवश्यक मिलेगा इसी लिए स्वयं को सुदारो स्वयं ही श्रेष्ठ

बनो आपने मन को शुद्ध करो यह भावना आगर हार वयक्ति दिल मे रख कर जिये तो
मंगलमय बुद्ध शासन इस धरती की उनती करेगा

🌷

सबका मंगल हो

🌷

गौतम बुद्ध

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गौतम बुद्ध (जन्म 563 ईसा पूर्व – निर्वाण 483 ईसा पूर्व) एक श्रमण थे जिनकी शिक्षाओं पर बौद्ध धर्म का प्रचलन हुआ।[1]

इनका जन्म लुंबिनी में 563 ईसा पूर्व इक्ष्वाकु वंशीय क्षत्रिय शाक्य कुल के राजा शुद्धोधन के घर में हुआ था। उनकी माँ का नाम महामाया था जो कोलीय वंश से थीं, जिनका इनके जन्म के सात दिन बाद निधन हुआ, उनका पालन महारानी की छोटी सगी बहन महाप्रजापती गौतमी ने किया। सिद्धार्थ विवाहोपरांत एक मात्र प्रथम नवजात शिशु राहुल और धर्मपत्नी यशोधरा को त्यागकर संसार को जरा, मरण, दुखों से मुक्ति दिलाने के मार्ग एवं सत्य दिव्य ज्ञान की खोज में रात्रि में राजपाठ का मोह त्यागकर वन की ओर चले गए। वर्षों की कठोर साधना के पश्चात बोध गया (बिहार) में बोधि वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई और वे सिद्धार्थ गौतम से भगवान बुद्ध बन गए।

जीवन वृत्त
उनका जन्म 563 ईस्वी पूर्व के बीच शाक्य गणराज्य की तत्कालीन राजधानी कपिलवस्तु के निकट लुम्बिनी में हुआ था, जो नेपाल में है।[2] लुम्बिनी वन नेपाल के तराई क्षेत्र में कपिलवस्तु और देवदह के बीच नौतनवा स्टेशन से 8 मील दूर पश्चिम में रुक्मिनदेई नामक स्थान के पास स्थित था। कपिलवस्तु की महारानी महामाया देवी के अपने नैहर देवदह जाते हुए रास्ते में प्रसव पीड़ा हुई और वहीं उन्होंने एक बालक को जन्म दिया। शिशु का नाम सिद्धार्थ रखा गया।[3] गौतम गोत्र में जन्म लेने के कारण वे गौतम भी कहलाए। क्षत्रिय राजा शुद्धोधन उनके पिता थे। परंपरागत कथा के अनुसार सिद्धार्थ की माता का उनके जन्म के सात दिन बाद निधन हो गया था। उनका पालन पोषण उनकी मौसी और शुद्दोधन की दूसरी रानी महाप्रजावती (गौतमी)ने किया। शिशु का नाम सिद्धार्थ दिया गया, जिसका अर्थ है “वह जो सिद्धी प्राप्ति के लिए जन्मा हो”। जन्म समारोह के दौरान, साधु द्रष्टा आसित ने अपने पहाड़ के निवास से घोषणा की- बच्चा या तो एक महान राजा या एक महान पवित्र पथ प्रदर्शक बनेगा।[4] शुद्दोधन ने पांचवें दिन एक नामकरण समारोह आयोजित किया और आठ ब्राह्मण विद्वानों को भविष्य पढ़ने के लिए आमंत्रित किया। सभी ने एक सी दोहरी भविष्यवाणी की, कि बच्चा या तो एक महान राजा या एक महान पवित्र आदमी बनेगा।[4] दक्षिण मध्य नेपाल में स्थित लुंबिनी में उस स्थल पर महाराज अशोक ने तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व बुद्ध के जन्म की स्मृति में एक स्तम्भ बनवाया था। बुद्ध का जन्म दिवस व्यापक रूप से थएरावदा देशों में मनाया जाता है।[4] सुद्धार्थ का मन वचपन से ही करुणा और दया का स्रोत था। इसका परिचय उनके आरंभिक जीवन की अनेक घटनाओं से पता चलता है। घुड़दौड़ में जब घोड़े दौड़ते और उनके मुँह से झाग निकलने लगता तो सिद्धार्थ उन्हें थका जानकर वहीं रोक देता और जीती हुई बाजी हार जाता। खेल में भी सिद्धार्थ को खुद हार जाना पसंद था क्योंकि किसी को हराना और किसी का दुःखी होना उससे नहीं देखा जाता था। सिद्धार्थ ने चचेरे भाई देवदत्त द्वारा तीर से घायल किए गए हंस की सहायता की और उसके प्राणों की रक्षा की।


शिक्षा एवं विवाह

सिद्धार्थ ने गुरु विश्वामित्र के पास वेद और उपनिषद्‌ को तो पढ़ा हीं , राजकाज और युद्ध-विद्या की भी शिक्षा ली। कुश्ती, घुड़दौड़, तीर-कमान, रथ हाँकने में कोई उसकी बराबरी नहीं कर पाता। सोलह वर्ष की उम्र में सिद्धार्थ का कन्या यशोधरा के साथ विवाह हुआ। पिता द्वारा ऋतुओं के अनुरूप बनाए गए वैभवशाली और समस्त भोगों से युक्त महल में वे यशोधरा के साथ रहने लगे जहाँ उनके पुत्र राहुल का जन्म हुआ। लेकिन विवाह के बाद उनका मन वैराग्य में चला और सम्यक सुख-शांति के लिए उन्होंने आपने परिवार का त्याग कर दिया।

विरक्ति
राजा शुद्धोधन ने सिद्धार्थ के लिए भोग-विलास का भरपूर प्रबंध कर दिया। तीन ऋतुओं के लायक तीन सुंदर महल बनवा दिए। वहाँ पर नाच-गान और मनोरंजन की सारी सामग्री जुटा दी गई। दास-दासी उसकी सेवा में रख दिए गए। पर ये सब चीजें सिद्धार्थ को संसार में बाँधकर नहीं रख सकीं। वसंत ऋतु में एक दिन सिद्धार्थ बगीचे की सैर पर निकले। उन्हें सड़क पर एक बूढ़ा आदमी दिखाई दिया। उसके दाँत टूट गए थे, बाल पक गए थे, शरीर टेढ़ा हो गया था। हाथ में लाठी पकड़े धीरे-धीरे काँपता हुआ वह सड़क पर चल रहा था। दूसरी बार कुमार जब बगीचे की सैर को निकला, तो उसकी आँखों के आगे एक रोगी आ गया। उसकी साँस तेजी से चल रही थी। कंधे ढीले पड़ गए थे। बाँहें सूख गई थीं। पेट फूल गया था। चेहरा पीला पड़ गया था। दूसरे के सहारे वह बड़ी मुश्किल से चल पा रहा था। तीसरी बार सिद्धार्थ को एक अर्थी मिली। चार आदमी उसे उठाकर लिए जा रहे थे। पीछे-पीछे बहुत से लोग थे। कोई रो रहा था, कोई छाती पीट रहा था, कोई अपने बाल नोच रहा था। इन दृश्यों ने सिद्धार्थ को बहुत विचलित किया। उन्होंने सोचा कि ‘धिक्कार है जवानी को, जो जीवन को सोख लेती है। धिक्कार है स्वास्थ्य को, जो शरीर को नष्ट कर देता है। धिक्कार है जीवन को, जो इतनी जल्दी अपना अध्याय पूरा कर देता है। क्या बुढ़ापा, बीमारी और मौत सदा इसी तरह होती रहेगी सौम्य? चौथी बार कुमार बगीचे की सैर को निकला, तो उसे एक संन्यासी दिखाई पड़ा। संसार की सारी भावनाओं और कामनाओं से मुक्त प्रसन्नचित्त संन्यासी ने सिद्धार्थ को आकृष्ट किया।

महाभिनिष्क्रमण

सुंदर पत्नी यशोधरा, दुधमुँहे राहुल और कपिलवस्तु जैसे राज्य का मोह छोड़कर सिद्धार्थ तपस्या के लिए चल पड़े। वह राजगृह पहुँचे। वहाँ भिक्षा माँगी। सिद्धार्थ घूमते-घूमते आलार कालाम और उद्दक रामपुत्र के पास पहुँचे। उनसे योग-साधना सीखी। समाधि लगाना सीखा। पर उससे उसे संतोष नहीं हुआ। वह उरुवेला पहुँचे और वहाँ पर तरह-तरह से तपस्या करने लगे।

सिद्धार्थ ने पहले तो केवल तिल-चावल खाकर तपस्या शुरू की, बाद में कोई भी आहार लेना बंद कर दिया। शरीर सूखकर काँटा हो गया। छः साल बीत गए तपस्या करते हुए। सिद्धार्थ की तपस्या सफल नहीं हुई। शांति हेतु बुद्ध का मध्यम मार्ग : एक दिन कुछ स्त्रियाँ किसी नगर से लौटती हुई वहाँ से निकलीं, जहाँ सिद्धार्थ तपस्या कर रहा थे। उनका एक गीत सिद्धार्थ के कान में पड़ा- ‘वीणा के तारों को ढीला मत छोड़ दो। ढीला छोड़ देने से उनका सुरीला स्वर नहीं निकलेगा। पर तारों को इतना कसो भी मत कि वे टूट जाएँ।’ बात सिद्धार्थ को जँच गई। वह मान गये कि नियमित आहार-विहार से ही योग सिद्ध होता है। अति किसी बात की अच्छी नहीं। किसी भी प्राप्ति के लिए मध्यम मार्ग ही ठीक होता है ओर इसके लिए कठोर तपस्या करनी पड़ती है।

ज्ञान की प्राप्ति

बुद्ध के प्रथम गुरु आलार कलाम थे,जिनसे उन्होंनेे संन्यास काल में शिक्षा प्राप्त की ।३५ वर्ष की आयु में वैशाखी पूर्णिमा के दिन सिद्धार्थ पीपल वृक्ष के नीचे ध्यानस्थ थे। बुद्ध ने बोधगया में निरंजना नदी के तट पर कठोर तपस्या की तथा सुजाता नामक लड़की के हाथों खीर खाकर उपवास तोड़ा। समीपवर्ती गाँव की एक स्त्री सुजाता को पुत्र हुआ।वह बेटे के लिए एक पीपल वृक्ष से मन्नत पूरी करने के लिए सोने के थाल में गाय के दूध की खीर भरकर पहुँची। सिद्धार्थ वहाँ बैठा ध्यान कर रहा था। उसे लगा कि वृक्षदेवता ही मानो पूजा लेने के लिए शरीर धरकर बैठे हैं। सुजाता ने बड़े आदर से सिद्धार्थ को खीर भेंट की और कहा- ‘जैसे मेरी मनोकामना पूरी हुई, उसी तरह आपकी भी हो।’ उसी रात को ध्यान लगाने पर सिद्धार्थ की साधना सफल हुई। उसे सच्चा बोध हुआ। तभी से सिद्धार्थ ‘बुद्ध’ कहलाए। जिस पीपल वृक्ष के नीचे सिद्धार्थ को बोध मिला वह बोधिवृक्ष कहलाया और गया का समीपवर्ती वह स्थान बोधगया

धर्म-चक्र-प्रवर्तन

वे 80 वर्ष की उम्र तक अपने धर्म का संस्कृत के बजाय उस समय की सीधी सरल लोकभाषा पाली में प्रचार करते रहे। उनके सीधे सरल धर्म की लोकप्रियता तेजी से बढ़ने लगी। चार सप्ताह तक बोधिवृक्ष के नीचे रहकर धर्म के स्वरूप का चिंतन करने के बाद बुद्ध धर्म का उपदेश करने निकल पड़े। आषाढ़ की पूर्णिमा को वे काशी के पास मृगदाव (वर्तमान में सारनाथ) पहुँचे। वहीं पर उन्होंने सर्वप्रथम धर्मोपदेश दिया और प्रथम पाँच मित्रों को अपना अनुयायी बनाया और फिर उन्हें धर्म प्रचार करने के लिये भेज दिया। महाप्रजापती गौतमी (बुद्ध की विमाता)को सर्वप्रथम बौद्ध संघ मे प्रवेश मिला।आनंद,बुद्ध का प्रिय शिष्य था। बुद्ध आनंद को ही संबोधित करके अपने उपदेश देते थे।

महापरिनिर्वाण

पालि सिद्धांत के महापरिनिर्वाण सुत्त के अनुसार ८० वर्ष की आयु में बुद्ध ने घोषणा की कि वे जल्द ही परिनिर्वाण के लिए रवाना होंगे। बुद्ध ने अपना आखिरी भोजन, जिसे उन्होंने कुन्डा नामक एक लोहार से एक भेंट के रूप में प्राप्त किया था, ग्रहण लिया जिसके कारण वे गंभीर रूप से बीमार पड़ गये। बुद्ध ने अपने शिष्य आनंद को निर्देश दिया कि वह कुन्डा को समझाए कि उसने कोई गलती नहीं की है। उन्होने कहा कि यह भोजन अतुल्य है।





धम्मनायक_अशोक_वीररत्ने

जर्मनी में बौद्ध धर्म का इतिहास 150 साल पुराना है शोपेनहावर पॉल डहालके कार्ल यूजेन न्यूमेन जॉर्ज ग्रीम फ्रेडरिक जिमरमन (भिक्षु सुभद्रा ) इन महान विद्वानों की वजहा से जर्मनी में थेरवादी बौद्ध धम्म का धम्मध्वज बड़े कुशलता से लहरा राथा इन महान नायको ने जर्मनी में बौद्ध धर्म के प्रचार में बी आपना बहुत काम किया अनागरिक धम्मपाल भिक्षु गुणानन्द जी के सांस्कृतिक धर्मिक क्रांति के बाद श्रीलंकन बौद्ध संगटनोने बौद्ध धम्म का प्रसार अन्य राष्ट्रों में बी हो यह इच्छा प्रकट की और बौद्ध धम्म को पश्चिम में प्रसार के लिए धम्मदूत सोसाइटी की स्थापना की जिसका नेतृव अशोक वीररत्ने जी ने किया अशोक वीररत्न जी इनका पूर्णा नाम अल्फर्ड था जो ईसाई थे बाद में चले धर्मिक सांस्कूतिक आंदोलन के बाद इनोने बौद्ध संस्कृति का नाम धारण किया और आपना नाम अशोक रखा 1952 में जर्मनी में जाने के बाद अशोक वीररत्न ने श्रीलंकन धम्मदूत सोसाइटी का नाम बदल कर जर्मन धम्मदूत सोसाइटी नाम रखा जिसका कार्य जर्मनी में बौद्ध धर्म का प्रचार करना था पॉल डहालके भिक्षु सुभद्र अन्य बौद्ध नायको ने बौद्ध धम्म के अनुकूल परिस्थिति जर्मनी में निर्माण की थी 1924 स्थापित दास बुद्धिषट हॉउस ने जर्मनी में बौद्ध धम्म का प्रचार आछे ओर योग्य प्रकार से किया धम्मदूत सोसाइटी आने की वजहा से जर्मनबौद्ध नायको को एक बड़ा बल मिला श्रीलंकन प्रधानमंत्री बन्दरनायके ने इन संघटनो को भरपूर मद्त की और बौद्ध मठ विहार स्थापना करने के लिए बहुत मद्त की अशोक वीररत्न जब जर्मन आये तब उन्हें अन्य यूरोपीयन बौद्ध विद्वानों से जर्मन बौद्ध विद्वान बहुत हुशार ओर बौद्ध अभ्यासक लगे उन्होंने इन बौद्ध मिशनरियों को श्रीलंकन सरकार से जोड़ने के लिए बहुत काम किया तब के श्रीलंकन सरकार ने बी बहुत मद्त इन संघटनो को किया और जर्मनी में बौद्ध धम्म के प्रसार के लिए मद्त की अशोक वीररत्न हमशा कहते थे धम्म प्रसार का कार्य जो सम्राट अशोक ने शुरू किया था वह अभी फिरसे शुरू करना होगा किउके इस हिंसक मय युग को बुद्ध की करुणा की जरूरत है अशोक वीररत्न जी जैसे जिद्दी और साहसी एक नष्ट व्यक्ति की जरूत भारतीय बौद्ध आंदोलन को है युवकों का उत्तर दायत्व है वे सामाजिक राजकीय आंदोलन के साथसाथ इस धर्मिक आंदोलन में बी भाग लेना चाहिए और बौद्ध धम्म के प्रसार के लिए काम करना चाहिए सबका मङ्गल हो

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