उत्तर:-
इस भौतिक जगत में जहां मानव सुख-दुख की अनुभूतियों से साक्षात्कार करता है वही इस काया के संचालन के लिये जहां वायु की आवश्यकता होती है वहीं दूसरी तरफ जल और भोजन की आवश्यकता भी होती है। यह मानव की मूलभूत आवश्यकताओं में से एक हैं। इनके बिना कोई भी प्राणी जीवित नहीं रह सकता है। जब भोजन की बात की जाती है तो व्यक्ति के पास खाने के लिये विभिन्न प्रकार की खाद्य सामग्री उपलब्ध है परंतु फिर भी हमारे मन मे खाद्य सामग्री के उपभोग के लिये कई बार संशय बना रहता है कि जो हम खा रहे हैं क्या वह धम्म अनुसार सही है या नही। विशेषकर मांस आहार के सम्बंध में यह प्रश्न सभी के मन मे रहता है। भिन्न-भिन्न धर्मों में मांस आहार के सम्बंध में भिन्न भिन्न मत हो सकते हैं। परंतु इसके सम्बन्ध मैं बौध्द धम्म के मत को लेकर कई प्रकार की भ्रांतियां हैं। कि क्या धम्म में मांस आहार वर्जित है या नहीं। जबकि भगवान बुद्ध प्राणी हिंसा के विपरीत उनपर करुणा और मैत्री की देशना देते हैं।
तथागत बुद्ध सभी प्राणियों के प्रति समान रूप से करुणा और मैत्री का भाव रखते थे इसकी पुष्टि पंचशीलों और निम्न सुत्तों से होती है। तथागत ने यह सद वचन कहे:
(1):
न तेन अरियो होति येन पाणानि हिंसति।
अहिंसा सब्बपाणानं अरियो’ति पवुच्चति।।’ (15)
-धम्मपद, धम्मट्ठ वग्गो,270
अर्थात ‘प्राणियों की हिंसा करने से (कोई) आर्य(श्रेष्ट) नहीं होता, सभी प्राणियों की हिंसा न करने से आर्य कहा जाता है।’
(2):
पाणं न हने न च घातयेय्य, न चानुजञ्ञा हनतं परेसं।
सब्बेसु भूतेसु निधाय दण्डं, ये थावरा ये च तसा सन्ति लोके।।
-धम्मिका सुत्त,19
अर्थात ‘संसार में जितने भी स्थावर और जंगम प्राणी हैं, न स्वयं उनके प्राण की हत्या करे, न किसी से करवाये ; न ही दूसरों को हत्या करने की अनुमति दे ! और न तो उन्हें हत्या करने की आज्ञा दे, सभी प्राणियों के प्रति दण्ड त्यागी हो।
(3):
सब्बे तसन्ति दण्डस्स सब्बे भायन्ति मच्चुनो।
अत्तानं उपमं कत्वा न हनेय्य न घातये ।।। (1)
-धम्मपद , दंड वग्गो ,129
अर्थात: ‘दण्ड से सभी डरते हैं, मृत्यु से सभी भय खाते है, अपने समान जानकर न किसी को मारें न मारने की प्रेरणा दें।’
(4):
जो योनिज या अण्डज किसी भी प्राणी की हिंसा करता है , जिसे प्राणियों के प्रति दया नही है , उसे वृषल(नीच) जानें ।
– वसल सुत्त
(5)
दुख निरोध के चौथे अरिये सत्य मैं भगवान बुद्ध अष्टांगिक मार्ग में सम्यक आजीविका के अंतर्गत माँस,पशुओं के क्रय- विक्रय, नशीले पदार्थ,विष और अस्त्र और शस्त्रों के व्यवसाय न करने के लिये देशना कहते हैं।
(6)
पाणातिपाता वेरमणी-सिक्खापदं समादयामि।।
(प्रथम शील)
अर्थात: भगवान बुद्ध के प्रथम शील से यह ज्ञात होता है कि हमें सभी प्राणीयों के प्रति सभी प्रकार की हिंसा नहीं करनी चाहिये, न करवानी चाहिये, न आदेश/अनुमति देनी चाहिए, न प्राणी हिंसा के लिये प्रेरित ही करना चाहिये औऱ न ही समर्थन करना चाहिये। इसके विपरीत अर्थ में हमें सभी पर करुणा और मैत्ती(मैत्री) भावना रखनी चाहिए और उनकी और स्वयं की रक्षा करनी चाहिए और प्राणी हिंसा करने वालों को हतोत्साहित करना चाहिये। चूंकि भगवान बुध्द का मार्ग मध्यम मार्ग है इस अर्थ में यह मार्ग अहिँसा में अतिवादी नहीं है। यह न केवल किये गए कर्म पर जोर देता है बल्कि किये गए कार्यं के पीछे की मंशा पर भी बल देता है। अर्थात एक माता जब आग की लपटों की और भागते हुए बालक को बार बार न रोक पाने में समर्थ न होकर एक चपत लगाती है। तब यह हिंसा की श्रेणी में नहीं कही जाती क्योकि यहां उद्देश्य/मंशा बालक को हानि पहुंचाने की नहीं बल्कि हानि से बचाने की है। ठीक इसी प्रकार आत्मरक्षा और देश की सीमाओं की सुरक्षा के लिय की गई हिंसा को भी इसी श्रेणी में रखा जाता है। सामान्य रूप से हिंसा और मांस आहार को एक साथ जोड़कर देखा जाता है। जबकि दोनो अलग-अलग हैं। यह आवश्यक नहीं कि जो व्यक्ति हिंसक हो वह मांस ग्रहण करता हो या जो व्यक्ति मांस आहार ग्रहण करता हो वह हिंसक हो। इस देह के संचालन के लिये पृथ्वी का कोई भी मानव बिना जीव हिंसा के कुछ मिनट भी जीवित रहना सम्भव नहीं है कारण है जल और वायु में अति सूक्ष्म जीवों का होना और वनस्पति का स्वयं सजीव होना। इन तीनो ही के अभाव में जीवन सम्भव नहीं है। परन्तु यह जीव हिंसा जानबूझ कर नहीं की जाती। और न ही इन सभी जीव हिंसा की कोई मंशा ही किसी मानव के मन में होती है। यह यहां मंशा जीव हत्या नहीं बल्कि जीवित रहने की होती है। जहाँ मंशा नेक हो वहाँ पाप का प्रश्न ही नहीं उठता। चूंकि पाप का मूल दूषित होता है। इसलिये यह पाप मुक्त कर्म है जो जीवन जीने के लिये अनिवार्य हैं। जैसे यदि उचित और निर्दोष मांस आहार पाप कर्म की श्रेणी में होता तो मांसाहारी जीव-जंतु भवचक्र में हमेशा ही फंसे रहेंगे और कभी मुक्त न हो सकेंगे। परन्तु वे भी पुनःजन्म पाते हैं और किसी न किसी जन्म में मुक्त होते हैं। कारण यह है कि वे माँसाहार भोजन को निष्पाप मंशा से ग्रहण करते हैं न कि हत्या, आखेट आदि के उद्देश्य से। उनकी मंशा हिंसा या किसी को कष्ट पहुंचना नही और न ही प्रताड़ित करना ही होती है । जबकी मांसाहारी जीव प्रकृति के नियम और कानून से बंधे हैं तो सर्वाहारी भी इसी नियम से बंधे हैं। और मानव सर्वाहारी है। उन्हें भी भूख लगती है परंतु वे पशुओ से समझदार हैं। पाप और पुण्य समझते हैं। इसलिये भगवान बुद्ध ने उचित और निष्पाप माँसाहार जो त्रिकोटी परिशुध्द हो और आहार या खाद्यान्न जानकर होशपूर्वक बिना किसी लोलुपता, आदि के ग्रहण किया जाता है उसे वर्जित नहीं किया है। लेकिन हिंसा की मंशा से सने माँसाहार को भगवान बुद्ध ने सावको के लिये निषेद्य किया है। भगवान बुद्ध ने केवल त्रिकोटी परिशुध्द उचित और निष्पाप माँस आहार को ही भोज्य कहा है त्रिकोटी परिशुध्द का अर्थ है 1)अदृष्ट:- मांस आहार प्राप्त करने के लिये किसी जीव की हिंसा/हत्या, हत्या की अनुमति /आदेश देते हुये न देखा हो। 2) अ-श्रुत:- माँसाहार प्रप्ति के लिये किसी जीव की हिंसा/हत्या, हत्या की अनुमति /आदेश देते हुये न सुना हो। 3)अ-परिसंकित: मांस आहार प्राप्त करने के लिये किसी भी जीव की किसी भी प्रकार की हिंसा/हत्या, हत्या की अनुमति /आदेश देने का संदेह न हो। उचित और निष्पाप मांस आहार से अर्थ उस दोष मुक्त मांस आहार से है जिसे सेवन करने वाला व्यक्ति अ-लोलुप हो अर्थात बिना परम् उत्सुक हो अ-मूर्छि हो, अर्थात होशपूर्वक होकर अनासक्त हो, अर्थात निर्लिप्त या बिना राग जगाए अवगुण का ख्याल रखते हुए, (आर्थात यह विषाक्त,दूषित, अवांछनीय या निषेद्य का खयाल रखते हुए) निस्तार की बुद्धि से खाता है। अर्थात अभिष्ट की प्राप्ति की बुद्धि से खाता है। और जिंसमे निज पीड़ा, पर -पीड़ा और उभय पीड़ा (स्वयं पीड़ा) का उस समय ख्याल नहीं होता वह उचित और निष्पाप मांस आहार है। जीवक सुत्त में तथागत कहते है: ————————————–
“…जीवक! तीन प्रकार के मांस को मैं भोज्य कहता हूं-
अ-दृष्ट,
अ-श्रुत,
अ-परिशंकित।”

“जीवक!
कोई भिक्खु किसी गांव, या निगम (=कस्बे) के पास विहार करता है। वह मैत्री-पूर्ण चित्त से सारे लोक को पूर्णकर विहरता है। उसके पास आकर कोई गहपति या गहपति-पुत्त दूसरे दिन के भोजन के लिए आमंत्रण देता है।
इच्छा होने पर जीवक!
भिक्खु (उस निमंत्रण) को स्वीकार करता है। वह उस रात के बीतने पर पूर्वाह्न समय पहनकर पात्र-चीवर ले, जहां उस गहपति या गहपति-पुत्त का घर होता है, वहां जाता है। जाकर बिछे आसन पर बैठता है। उसे वह गहपति या गहपति-पुत्त उत्तम पिंडपात (भिक्खान्न) परोसता है।
उस (भिक्खु) को यह नहीं होता-
‘अहो! यह गहपति या गहपति-पुत्त मुझे उत्तम पिंडपात परोसे।
अहो! यह आगे भी इसी प्रकार का पिंडपात परोसे।
वह उस पिंडपात को अ-लोलुप,अ-मूर्छित हो, अनासक्त हो,अवगुण का ख्याल रखते, निस्तार की बुद्धि से खाता है।
तो क्या मानते हो, जीवक! क्या वह भिक्खु उस समय
निज-पीड़ा (की बात) को सोचता है,
पर-पीड़ा को सोचता है,
(स्वयं पर) उभय-पीड़ा को सोचता है?”
“नहीं, भन्ते!”
“क्यों जीवक! उस समय वह निर्दोष (=अनवद्य) आहार ही का ग्रहण कर रहा है न?”
“हां, भन्ते!
मैंने सुना है भन्ते! कि ब्रह्मा मैत्री-विहारी (=सदा सबको मित्र भाव से देखने वाला) है;
सो मैंने भन्ते! भगवान् साक्षात् देख लिया। भन्ते! भगवान मैत्री विहारी हैं।”………………………………………
“जो कोई जीवक!
तथागत या तथागत के सावक (श्रावक) के उद्देश्य से जीव मारता है, वह पांच स्थानों से अ-पुण्य (=पाप) कमाता है,
(1) जो वह यह कहता है-
‘जाओ, अमुक जीव को लाओ’;
इस पहले स्थान (=बात से) वह बहुत अपुण्य कमाता है।
(2) जो वह गले में (रस्सी) बांधकर खींच कर लाते (पशु) को (देख) दुख-दौर्मनस्य अनुभव करता है,
इस दूसरे स्थान से वह बहुत अ-पुण्य कमाता है।
(3) जो वह यह कहता है-
‘जाओ; इस जीव को मारो’
इस तीसरे स्थान से वह बहुत अ-पुण्य कमाता है।
(4) जो वह जीवों को मारते दुख-दौर्मनस्य (=संताप) अनुभव करता है; इस चौथे स्थान से वह बहुत अ-पुण्य कमाता है।।
(5) जो वह तथागत या तथागत के श्रावक को अ-कल्प्य (अनुचित, अविहित)को खिलाता है; इस पांचवें स्थान से वह बहुत अ-पुण्य कमाता है।।”
…”जो कोई जीवक! तथागत या तथागत के सावक के उद्देश्य से जीव मारता है, वह इन पांचों स्थानों से अ-पुण्य कमाता है।”
….इस पर जीवक ने कहा-
कल्प्य (उचित, विहित) आहार को भन्ते! भिक्खु ग्रहण करते हैं। अहो! निर्दोष आहार को भन्ते! भिक्खु ग्रहण करते हैं। “
-जीवक-सुत्त (2.1.5),
(गहपतिवग्ग,मज्झिम-पण्णासक, मज्झिम निकाय)
त्रिकोटी परिशुध्द का माँस का अर्थ कुछ जन मृत पशु से निकालते हैं जो निष्पाप मांस तो है लेकिन उचित मांस नहीं किसी भी मांस का उचित तभी कहा जा सकता है भगवान द्वारा बताए उपर्युक्त नियमों अन्य तीन अन्य नियमो पर आधारित हो।
1) वह खाद्य मांस दूषित न हो
2) वह सर्वाहारी (मानव, कुत्ता, बिल्ली ,कौआ आदि) या मांसाहारी पशुओं जैसे शेर ,भेड़िया, गिद्ध,चील, आदि और घोड़ा, हाथी आदि का माँस न हो।
3) वह विषाक्त जीव या विषाक्त न हो।
तेलोवाद(बालोवाद) जातक कथा(246)
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तेलोवाद(बालोवाद) जातक कथा(246) में भगवान बुद्ध ने सिंह सेनापति के बारे में यह गाथा कहि जब निगण्ठ ने भगवान बुद्ध की आलोचना की। तब उन्होंने अतीत जन्म की एक गाथा कही जिंसमे बोधिसत्व तपस्वी थे और निगण्ठ गृहस्थ। जब बोधिसत्व हिमालय से वाराणसी गए तब भिक्खाचार के लिये नकल तब एक ग्रहस्थ ने तपस्वी को तंग करने के उद्देश्य से मछली के मांस का भोजन कराने के बाद कहा कि यह मांस प्राणीयों को मार कर तुम्हारे लिये ही तैयार क्या गया है यह पाप केवल हमें ही न लगे तुम्हें भी लगे यह कहकर उसने यह गाथा कहि – “हन्त्वा झत्वा वघित्वा च देति दानं असञ्ञो, एदिसं भत्त भुञ्जमानो स पापेन उपलिप्पति।।” अर्थात :मारकर कष्ट देकर वध करके असंयमी दुष्शील ऐसा करके इस प्रकार दान देता है। इस प्रकार उद्देश्य करके बनाये हुए भोजन को खाने वाला श्रमण (भिक्खु) भी पाप से युक्त होता है। इस पर बोधिसत्व(अतीत जन्म के बुद्ध) ने दूसरी गाथा कहि- “पुत्तदारम्पि चे हन्त्वा देति दानं असञ्ञो, भुञ्जमानो पि सप्पञ्ञो न पापेन उपलिप्पति।।” अर्थात: दूसरे माँस की बात रही।। पुत्र स्त्री को भी मार कर दुष्शील द्वारा दिये गये दान को पञ्ञावान, क्षमा, मैत्ती आदि गुणों से युक्त खाने वाला पाप से लिप्त नहीं होता। आमगन्ध सुत्त वर्णन ———————— आम गन्ध सुत्त भी मांस आहार पर प्रकाश डालता है ।आमगन्ध सुत्त में भगवान बुध्द आमगन्ध नामक ब्राहमण को कश्यप बुद्ध द्वारा तिस्स को दी गई देशना का उल्लेख करते हुए यह वचन कहते हैं। यहां आमगन्ध शब्द का प्रयोग मछली के मांस और पाप कर्म के रूप में हुआ है। यहाँ इस बात पर बल दिया गया है कि केवल मछली के मांस का सेवन न करने से आमगन्ध(पाप कर्म) का वर्जन नहीं होता। पाणातिपातोवधछेदबन्धनं,थेय्यं मुसावादो निकतिवचनानि च । अज्झेनकुतं परदार सेवना,एसामगन्धो न हि मंसभोजनं ।।४।। ये इध कामेसु असञ्ञता जना,रसेसु गिद्धा असुचीकमिस्सिता । नत्थीकदि”ट्ठी विसमा दुरन्नया, एसामगन्धो न हि मंसभोजनं ।।५।। ये लूखसा दारुणा पिट्टिमंसिका, मित्तद्दनो निकरुणातिमानिनो। अर्थात: “कश्यप बुद्धः- जीवहिंसा, वध, बन्धन, चोरी, असत्य, धोखाबाजी, ठगी, निरर्थक अध्ययन तथा परस्त्री-गमन-यह सब है आमगन्ध न कि मांसाहार ||४|| “जो लोग विषय-भोग में संयम नहीं रखते, रसास्वादन में लिप्त हैं, पापी हैं। और विषम, टेढ़ी नास्तिक दृष्टिवाले हैं-यह है आमगन्ध न कि मांसाहार ।।५।। ” …….. पतन्ति सत्ता निरयं अवंसिरा, एसामगन्धो न हि मंसभोजनं ।।१०।। नमच्छमंसानमनासकतं,न नग्गिय(मुण्ड्यिंजटा)ज खराजिनानि वा नाग्गिहुत्तस्सुपसेवना वा, ये वापि लोके अमरा बहू तपा । मन्ताहुती यसमुतूपसेवना, सोधेन्ति मच्चं अवितिण्णकलं ।।११।। सोतेसु गुत्तो विदितिन्द्रियो चरे, धम्मे ठितो अजवमहवे रतो । -आमगन्ध-सुत्त, अर्थात:- “जो लोग लालच या विरोध-भाव से जीव-हिंसा पर तुले हुए हैं, वे परलोक में अन्धकार को प्राप्त होते हैं और उलटे सिर नरक में पड़ते हैं-यह है आमगन्ध न कि मांसाहार ॥१०॥ “न तो मछली-मांस न खाना, न नंगा रहना, न मुंडन करना, न जटा धारण करना, न धूल पोतना, न कर्कश मृग-चर्म पहनना, न अग्नि-परिचर्या, न अमरत्व की आकांक्षा से अनेक प्रकार का तप करना, न मंत्र पाठ करना, न हवन करना, न यज्ञ करना और न ऋतुओं का उपसेवन करना ही संशययुक्त मनुष्य को शुद्ध कर सकते है ।।११।। टिप्पणी: पापकर्म को आमगन्ध(पाप) कहते हैं न कि मांस आहार को। परन्तु जब यही मांस आहार शिकार,लालच और हत्या आदि के उद्देश्य से प्राप्त किया जाता है तब यही माँसाहार आमगन्ध बन जाता है चूंकि अब इसमें हिंसा है या हिंसा के भाव होते हैं। नमो बुद्धाय अनिल गौतम (बुद्ध, धम्म ,संघ अनुगामी) आदि लेख में कोई जानकारी जोड़ी जा सके तो सभी के लिये आनंद का विषय होगा। —————————————————————— सम्पूर्ण आमगन्ध सुत्त: —————–




