प्रश्न: क्या बौद्ध धम्म माँसाहार की अनुमति देता है? या प्रश्न: बौद्ध धम्म में मांस आहार गलत या सही? 🐮🐏🐃🐑🐐🐓🐮🐏🐃🐑🐐🐓🐮🐏🐃

उत्तर:-

इस भौतिक जगत में जहां मानव सुख-दुख की अनुभूतियों से साक्षात्कार करता है वही इस काया के संचालन के लिये जहां वायु की आवश्यकता होती है वहीं दूसरी तरफ जल और भोजन की आवश्यकता भी होती है। यह मानव की मूलभूत आवश्यकताओं में से एक हैं। इनके बिना कोई भी प्राणी जीवित नहीं रह सकता है। जब भोजन की बात की जाती है तो व्यक्ति के पास खाने के लिये विभिन्न प्रकार की खाद्य सामग्री उपलब्ध है परंतु फिर भी हमारे मन मे खाद्य सामग्री के उपभोग के लिये कई बार संशय बना रहता है कि जो हम खा रहे हैं क्या वह धम्म अनुसार सही है या नही। विशेषकर मांस आहार के सम्बंध में यह प्रश्न सभी के मन मे रहता है। भिन्न-भिन्न धर्मों में मांस आहार के सम्बंध में भिन्न भिन्न मत हो सकते हैं। परंतु इसके सम्बन्ध मैं बौध्द धम्म के मत को लेकर कई प्रकार की भ्रांतियां हैं। कि क्या धम्म में मांस आहार वर्जित है या नहीं। जबकि भगवान बुद्ध प्राणी हिंसा के विपरीत उनपर करुणा और मैत्री की देशना देते हैं।
तथागत बुद्ध सभी प्राणियों के प्रति समान रूप से करुणा और मैत्री का भाव रखते थे इसकी पुष्टि पंचशीलों और निम्न सुत्तों से होती है। तथागत ने यह सद वचन कहे:
(1):
न तेन अरियो होति येन पाणानि हिंसति।
अहिंसा सब्बपाणानं अरियो’ति पवुच्चति।।’ (15)
-धम्मपद, धम्मट्ठ वग्गो,270
अर्थात ‘प्राणियों की हिंसा करने से (कोई) आर्य(श्रेष्ट) नहीं होता, सभी प्राणियों की हिंसा न करने से आर्य कहा जाता है।’
(2):
पाणं न हने न च घातयेय्य, न चानुजञ्ञा हनतं परेसं।
सब्बेसु भूतेसु निधाय दण्डं, ये थावरा ये च तसा सन्ति लोके।।
-धम्मिका सुत्त,19
अर्थात ‘संसार में जितने भी स्थावर और जंगम प्राणी हैं, न स्वयं उनके प्राण की हत्या करे, न किसी से करवाये ; न ही दूसरों को हत्या करने की अनुमति दे ! और न तो उन्हें हत्या करने की आज्ञा दे, सभी प्राणियों के प्रति दण्ड त्यागी हो।
(3):
सब्बे तसन्ति दण्डस्स सब्बे भायन्ति मच्चुनो।
अत्तानं उपमं कत्वा न हनेय्य न घातये ।।। (1)
-धम्मपद , दंड वग्गो ,129
अर्थात: ‘दण्ड से सभी डरते हैं, मृत्यु से सभी भय खाते है, अपने समान जानकर न किसी को मारें न मारने की प्रेरणा दें।’
(4):
जो योनिज या अण्डज किसी भी प्राणी की हिंसा करता है , जिसे प्राणियों के प्रति दया नही है , उसे वृषल(नीच) जानें ।
– वसल सुत्त
(5)
दुख निरोध के चौथे अरिये सत्य मैं भगवान बुद्ध अष्टांगिक मार्ग में सम्यक आजीविका के अंतर्गत माँस,पशुओं के क्रय- विक्रय, नशीले पदार्थ,विष और अस्त्र और शस्त्रों के व्यवसाय न करने के लिये देशना कहते हैं।
(6)
पाणातिपाता वेरमणी-सिक्खापदं समादयामि।।
(प्रथम शील)

अर्थात: भगवान बुद्ध के प्रथम शील से यह ज्ञात होता है कि हमें सभी प्राणीयों के प्रति सभी प्रकार की हिंसा नहीं करनी चाहिये, न करवानी चाहिये, न आदेश/अनुमति देनी चाहिए, न प्राणी हिंसा के लिये प्रेरित ही करना चाहिये औऱ न ही समर्थन करना चाहिये। इसके विपरीत अर्थ में हमें सभी पर करुणा और मैत्ती(मैत्री) भावना रखनी चाहिए और उनकी और स्वयं की रक्षा करनी चाहिए और प्राणी हिंसा करने वालों को हतोत्साहित करना चाहिये। चूंकि भगवान बुध्द का मार्ग मध्यम मार्ग है इस अर्थ में यह मार्ग अहिँसा में अतिवादी नहीं है। यह न केवल किये गए कर्म पर जोर देता है बल्कि किये गए कार्यं के पीछे की मंशा पर भी बल देता है। अर्थात एक माता जब आग की लपटों की और भागते हुए बालक को बार बार न रोक पाने में समर्थ न होकर एक चपत लगाती है। तब यह हिंसा की श्रेणी में नहीं कही जाती क्योकि यहां उद्देश्य/मंशा बालक को हानि पहुंचाने की नहीं बल्कि हानि से बचाने की है। ठीक इसी प्रकार आत्मरक्षा और देश की सीमाओं की सुरक्षा के लिय की गई हिंसा को भी इसी श्रेणी में रखा जाता है। सामान्य रूप से हिंसा और मांस आहार को एक साथ जोड़कर देखा जाता है। जबकि दोनो अलग-अलग हैं। यह आवश्यक नहीं कि जो व्यक्ति हिंसक हो वह मांस ग्रहण करता हो या जो व्यक्ति मांस आहार ग्रहण करता हो वह हिंसक हो। इस देह के संचालन के लिये पृथ्वी का कोई भी मानव बिना जीव हिंसा के कुछ मिनट भी जीवित रहना सम्भव नहीं है कारण है जल और वायु में अति सूक्ष्म जीवों का होना और वनस्पति का स्वयं सजीव होना। इन तीनो ही के अभाव में जीवन सम्भव नहीं है। परन्तु यह जीव हिंसा जानबूझ कर नहीं की जाती। और न ही इन सभी जीव हिंसा की कोई मंशा ही किसी मानव के मन में होती है। यह यहां मंशा जीव हत्या नहीं बल्कि जीवित रहने की होती है। जहाँ मंशा नेक हो वहाँ पाप का प्रश्न ही नहीं उठता। चूंकि पाप का मूल दूषित होता है। इसलिये यह पाप मुक्त कर्म है जो जीवन जीने के लिये अनिवार्य हैं। जैसे यदि उचित और निर्दोष मांस आहार पाप कर्म की श्रेणी में होता तो मांसाहारी जीव-जंतु भवचक्र में हमेशा ही फंसे रहेंगे और कभी मुक्त न हो सकेंगे। परन्तु वे भी पुनःजन्म पाते हैं और किसी न किसी जन्म में मुक्त होते हैं। कारण यह है कि वे माँसाहार भोजन को निष्पाप मंशा से ग्रहण करते हैं न कि हत्या, आखेट आदि के उद्देश्य से। उनकी मंशा हिंसा या किसी को कष्ट पहुंचना नही और न ही प्रताड़ित करना ही होती है । जबकी मांसाहारी जीव प्रकृति के नियम और कानून से बंधे हैं तो सर्वाहारी भी इसी नियम से बंधे हैं। और मानव सर्वाहारी है। उन्हें भी भूख लगती है परंतु वे पशुओ से समझदार हैं। पाप और पुण्य समझते हैं। इसलिये भगवान बुद्ध ने उचित और निष्पाप माँसाहार जो त्रिकोटी परिशुध्द हो और आहार या खाद्यान्न जानकर होशपूर्वक बिना किसी लोलुपता, आदि के ग्रहण किया जाता है उसे वर्जित नहीं किया है। लेकिन हिंसा की मंशा से सने माँसाहार को भगवान बुद्ध ने सावको के लिये निषेद्य किया है। भगवान बुद्ध ने केवल त्रिकोटी परिशुध्द उचित और निष्पाप माँस आहार को ही भोज्य कहा है त्रिकोटी परिशुध्द का अर्थ है 1)अदृष्ट:- मांस आहार प्राप्त करने के लिये किसी जीव की हिंसा/हत्या, हत्या की अनुमति /आदेश देते हुये न देखा हो। 2) अ-श्रुत:- माँसाहार प्रप्ति के लिये किसी जीव की हिंसा/हत्या, हत्या की अनुमति /आदेश देते हुये न सुना हो। 3)अ-परिसंकित: मांस आहार प्राप्त करने के लिये किसी भी जीव की किसी भी प्रकार की हिंसा/हत्या, हत्या की अनुमति /आदेश देने का संदेह न हो। उचित और निष्पाप मांस आहार से अर्थ उस दोष मुक्त मांस आहार से है जिसे सेवन करने वाला व्यक्ति अ-लोलुप हो अर्थात बिना परम् उत्सुक हो अ-मूर्छि हो, अर्थात होशपूर्वक होकर अनासक्त हो, अर्थात निर्लिप्त या बिना राग जगाए अवगुण का ख्याल रखते हुए, (आर्थात यह विषाक्त,दूषित, अवांछनीय या निषेद्य का खयाल रखते हुए) निस्तार की बुद्धि से खाता है। अर्थात अभिष्ट की प्राप्ति की बुद्धि से खाता है। और जिंसमे निज पीड़ा, पर -पीड़ा और उभय पीड़ा (स्वयं पीड़ा) का उस समय ख्याल नहीं होता वह उचित और निष्पाप मांस आहार है। जीवक सुत्त में तथागत कहते है: ————————————–

“…जीवक! तीन प्रकार के मांस को मैं भोज्य कहता हूं-
अ-दृष्ट,
अ-श्रुत,
अ-परिशंकित।”

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“जीवक!
कोई भिक्खु किसी गांव, या निगम (=कस्बे) के पास विहार करता है। वह मैत्री-पूर्ण चित्त से सारे लोक को पूर्णकर विहरता है। उसके पास आकर कोई गहपति या गहपति-पुत्त दूसरे दिन के भोजन के लिए आमंत्रण देता है।
इच्छा होने पर जीवक!
भिक्खु (उस निमंत्रण) को स्वीकार करता है। वह उस रात के बीतने पर पूर्वाह्न समय पहनकर पात्र-चीवर ले, जहां उस गहपति या गहपति-पुत्त का घर होता है, वहां जाता है। जाकर बिछे आसन पर बैठता है। उसे वह गहपति या गहपति-पुत्त उत्तम पिंडपात (भिक्खान्न) परोसता है।
उस (भिक्खु) को यह नहीं होता-
‘अहो! यह गहपति या गहपति-पुत्त मुझे उत्तम पिंडपात परोसे।
अहो! यह आगे भी इसी प्रकार का पिंडपात परोसे।
वह उस पिंडपात को अ-लोलुप,अ-मूर्छित हो, अनासक्त हो,अवगुण का ख्याल रखते, निस्तार की बुद्धि से खाता है।
तो क्या मानते हो, जीवक! क्या वह भिक्खु उस समय
निज-पीड़ा (की बात) को सोचता है,
पर-पीड़ा को सोचता है,
(स्वयं पर) उभय-पीड़ा को सोचता है?”
“नहीं, भन्ते!”
“क्यों जीवक! उस समय वह निर्दोष (=अनवद्य) आहार ही का ग्रहण कर रहा है न?”
“हां, भन्ते!
मैंने सुना है भन्ते! कि ब्रह्मा मैत्री-विहारी (=सदा सबको मित्र भाव से देखने वाला) है;
सो मैंने भन्ते! भगवान् साक्षात् देख लिया। भन्ते! भगवान मैत्री विहारी हैं।”………………………………………
“जो कोई जीवक!
तथागत या तथागत के सावक (श्रावक) के उद्देश्य से जीव मारता है, वह पांच स्थानों से अ-पुण्य (=पाप) कमाता है,
(1) जो वह यह कहता है-
‘जाओ, अमुक जीव को लाओ’;
इस पहले स्थान (=बात से) वह बहुत अपुण्य कमाता है।
(2) जो वह गले में (रस्सी) बांधकर खींच कर लाते (पशु) को (देख) दुख-दौर्मनस्य अनुभव करता है,
इस दूसरे स्थान से वह बहुत अ-पुण्य कमाता है।
(3) जो वह यह कहता है-
‘जाओ; इस जीव को मारो’
इस तीसरे स्थान से वह बहुत अ-पुण्य कमाता है।
(4) जो वह जीवों को मारते दुख-दौर्मनस्य (=संताप) अनुभव करता है; इस चौथे स्थान से वह बहुत अ-पुण्य कमाता है।।
(5) जो वह तथागत या तथागत के श्रावक को अ-कल्प्य (अनुचित, अविहित)को खिलाता है; इस पांचवें स्थान से वह बहुत अ-पुण्य कमाता है।।”
…”जो कोई जीवक! तथागत या तथागत के सावक के उद्देश्य से जीव मारता है, वह इन पांचों स्थानों से अ-पुण्य कमाता है।”
….इस पर जीवक ने कहा-
कल्प्य (उचित, विहित) आहार को भन्ते! भिक्खु ग्रहण करते हैं। अहो! निर्दोष आहार को भन्ते! भिक्खु ग्रहण करते हैं। “
-जीवक-सुत्त (2.1.5),
(गहपतिवग्ग,मज्झिम-पण्णासक, मज्झिम निकाय)
त्रिकोटी परिशुध्द का माँस का अर्थ कुछ जन मृत पशु से निकालते हैं जो निष्पाप मांस तो है लेकिन उचित मांस नहीं किसी भी मांस का उचित तभी कहा जा सकता है भगवान द्वारा बताए उपर्युक्त नियमों अन्य तीन अन्य नियमो पर आधारित हो।
1) वह खाद्य मांस दूषित न हो
2) वह सर्वाहारी (मानव, कुत्ता, बिल्ली ,कौआ आदि) या मांसाहारी पशुओं जैसे शेर ,भेड़िया, गिद्ध,चील, आदि और घोड़ा, हाथी आदि का माँस न हो।
3) वह विषाक्त जीव या विषाक्त न हो।
तेलोवाद(बालोवाद) जातक कथा(246)
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तेलोवाद(बालोवाद) जातक कथा(246) में भगवान बुद्ध ने सिंह सेनापति के बारे में यह गाथा कहि जब निगण्ठ ने भगवान बुद्ध की आलोचना की। तब उन्होंने अतीत जन्म की एक गाथा कही जिंसमे बोधिसत्व तपस्वी थे और निगण्ठ गृहस्थ। जब बोधिसत्व हिमालय से वाराणसी गए तब भिक्खाचार के लिये नकल तब एक ग्रहस्थ ने तपस्वी को तंग करने के उद्देश्य से मछली के मांस का भोजन कराने के बाद कहा कि यह मांस प्राणीयों को मार कर तुम्हारे लिये ही तैयार क्या गया है यह पाप केवल हमें ही न लगे तुम्हें भी लगे यह कहकर उसने यह गाथा कहि – “हन्त्वा झत्वा वघित्वा च देति दानं असञ्ञो, एदिसं भत्त भुञ्जमानो स पापेन उपलिप्पति।।” अर्थात :मारकर कष्ट देकर वध करके असंयमी दुष्शील ऐसा करके इस प्रकार दान देता है। इस प्रकार उद्देश्य करके बनाये हुए भोजन को खाने वाला श्रमण (भिक्खु) भी पाप से युक्त होता है। इस पर बोधिसत्व(अतीत जन्म के बुद्ध) ने दूसरी गाथा कहि- “पुत्तदारम्पि चे हन्त्वा देति दानं असञ्ञो, भुञ्जमानो पि सप्पञ्ञो न पापेन उपलिप्पति।।” अर्थात: दूसरे माँस की बात रही।। पुत्र स्त्री को भी मार कर दुष्शील द्वारा दिये गये दान को पञ्ञावान, क्षमा, मैत्ती आदि गुणों से युक्त खाने वाला पाप से लिप्त नहीं होता। आमगन्ध सुत्त वर्णन ———————— आम गन्ध सुत्त भी मांस आहार पर प्रकाश डालता है ।आमगन्ध सुत्त में भगवान बुध्द आमगन्ध नामक ब्राहमण को कश्यप बुद्ध द्वारा तिस्स को दी गई देशना का उल्लेख करते हुए यह वचन कहते हैं। यहां आमगन्ध शब्द का प्रयोग मछली के मांस और पाप कर्म के रूप में हुआ है। यहाँ इस बात पर बल दिया गया है कि केवल मछली के मांस का सेवन न करने से आमगन्ध(पाप कर्म) का वर्जन नहीं होता। पाणातिपातोवधछेदबन्धनं,थेय्यं मुसावादो निकतिवचनानि च । अज्झेनकुतं परदार सेवना,एसामगन्धो न हि मंसभोजनं ।।४।। ये इध कामेसु असञ्ञता जना,रसेसु गिद्धा असुचीकमिस्सिता । नत्थीकदि”ट्ठी विसमा दुरन्नया, एसामगन्धो न हि मंसभोजनं ।।५।। ये लूखसा दारुणा पिट्टिमंसिका, मित्तद्दनो निकरुणातिमानिनो। अर्थात: “कश्यप बुद्धः- जीवहिंसा, वध, बन्धन, चोरी, असत्य, धोखाबाजी, ठगी, निरर्थक अध्ययन तथा परस्त्री-गमन-यह सब है आमगन्ध न कि मांसाहार ||४|| “जो लोग विषय-भोग में संयम नहीं रखते, रसास्वादन में लिप्त हैं, पापी हैं। और विषम, टेढ़ी नास्तिक दृष्टिवाले हैं-यह है आमगन्ध न कि मांसाहार ।।५।। ” …….. पतन्ति सत्ता निरयं अवंसिरा, एसामगन्धो न हि मंसभोजनं ।।१०।। नमच्छमंसानमनासकतं,न नग्गिय(मुण्ड्यिंजटा)ज खराजिनानि वा नाग्गिहुत्तस्सुपसेवना वा, ये वापि लोके अमरा बहू तपा । मन्ताहुती यसमुतूपसेवना, सोधेन्ति मच्चं अवितिण्णकलं ।।११।। सोतेसु गुत्तो विदितिन्द्रियो चरे, धम्मे ठितो अजवमहवे रतो । -आमगन्ध-सुत्त, अर्थात:- “जो लोग लालच या विरोध-भाव से जीव-हिंसा पर तुले हुए हैं, वे परलोक में अन्धकार को प्राप्त होते हैं और उलटे सिर नरक में पड़ते हैं-यह है आमगन्ध न कि मांसाहार ॥१०॥ “न तो मछली-मांस न खाना, न नंगा रहना, न मुंडन करना, न जटा धारण करना, न धूल पोतना, न कर्कश मृग-चर्म पहनना, न अग्नि-परिचर्या, न अमरत्व की आकांक्षा से अनेक प्रकार का तप करना, न मंत्र पाठ करना, न हवन करना, न यज्ञ करना और न ऋतुओं का उपसेवन करना ही संशययुक्त मनुष्य को शुद्ध कर सकते है ।।११।। टिप्पणी: पापकर्म को आमगन्ध(पाप) कहते हैं न कि मांस आहार को। परन्तु जब यही मांस आहार शिकार,लालच और हत्या आदि के उद्देश्य से प्राप्त किया जाता है तब यही माँसाहार आमगन्ध बन जाता है चूंकि अब इसमें हिंसा है या हिंसा के भाव होते हैं। नमो बुद्धाय अनिल गौतम (बुद्ध, धम्म ,संघ अनुगामी) आदि लेख में कोई जानकारी जोड़ी जा सके तो सभी के लिये आनंद का विषय होगा। —————————————————————— सम्पूर्ण आमगन्ध सुत्त: —————–

आलसी लोगो का पराभव मार करता है

खुद्द#सुभानुपस्सि_विहरन्त_इंद्रियेसु_असंवुत्तं #भोजनामहि_आमतननु_कुसीत_हिनवीरीय #तँ_व_पसहती_मारो_वातो_रूकख_व_दुब्बल यमकवग्ग गाथा (7) जो वयक्ति विलासी जीवन जिनेमे ही धन्यता मान कर आपने इंद्रिय पर का सन्तुलन छोड़ दे जो वयक्ति भोजन में भोजन की मात्रा नाजाने जो आलसी ओर उद्योगहीन हो इस तरहा के वयक्ति का पराभव मार करता है जैसा हवा दुर्बल पेड़ को उखाड़ फेकता है कुछ लोग आपने पास जो धन सम्पति है उसके अहंकार में लीन हो जाते वह लोग कुछ क्षण के सुख को जीवन भर का सुख मानते है और अहंकारभाव मे लीन हो जाते वे ना धम्म का पालन करते है ना शीलो का आयसे मनुष्य में आलस निर्माण होता है वे दुर्बल हो जाता है भोजन पर नियंत्रण रखना बी मानव के लिए महत्व पूर्ण है जो वयक्ति भोजन पर नियंत्रण नही रखता वे विकारो से जखडा जाता है सम्यक सम्बुद्ध आपने बहुत सारे उपदेशो में मनुष्य को मानसिक सक्षम ओर भैतिक सक्षम बनजाने का उपदेश करते है इस गाथा का पालन करे और आपने मन ओर शरीर को दुर्बल बनेसे रोखे सबका मंगल हो नमो बुद्धायChat conversation endType a message…

“परिजिण्णमिदं रूपं, रोगनिड्ड पभंगुरं।”

शरीर रोगों का घर है।

एक समय भगवान बुद्ध श्रावस्ती के जेतवन में विहार करते थे। उस समय की एक घटना है।

उस समय भगवान के भिक्खुणीसंघ में उत्तरा प्रमुख थेरी थी। एक सौ पच्चीस साल की उम्र होते हुए भी उत्तरा थेरी स्वयं भिक्खाटन करती थी। विनय का कड़ाई से पालन करती थी।

एक दिन उत्तरा थेरी भिक्खाटन से वापस आ रही थी, सामने से शास्ता बुद्ध आते देखकर सम्मान देने के लिए उसने अपना कदम पीछे हटाया, वह पीछे हटना चाहती थी। शरीर वृद्ध था,वह अपने को संभाल न पाई और गिर पड़ी। भगवान उसके पास आए, उसे संभाला और बोले :-

“बहिन ! यह शरीर जीर्णशीर्ण हो चुका है। ज्यादा समय नहीं बचा है।यह शरीर बिखर जायेगा और मृत्यु हो जायेगी। यह शरीर, यह रूप सब जराजीर्ण है, रोगों का घर है और क्षणभंगुर है ‌ दुर्गंध से भरा यह शरीर नष्ट हो जाता है, खण्ड-खण्ड हो जाता है फिर जीवन शेष नहीं रहता है। लेकिन मृत्यु पर्यन्त ही जीवन है।अन्त में सभी का मरण आवश्यक है। यह प्रतीत्यसमुत्पाद है। द्वादश निदान का यही नियम है। जीवन से मृत्यु पर्यन्त यह चलता है फिर नया क्रम शुरू होता है।

भगवान ने गाथा में कहा :-

“परिजिण्णमिदं रूपं,
रोगनिड्ड पभंगुरं।
भिज्जति पूतिसन्देहो,
मरणन्तं हि जीवितं।।”
— धम्मपद

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सबका मंगल हो

#मिथ्या_धारणा_प्रहाण

नदी में स्नान करने से पाप कभी धुलते नहीं, शरीर का मैल दूर हो सकता हैं, लेकिन मन का मैल वैसे ही वैसे रहता हैं । शील का आचरण ही मन का मैल दूर करता हैं ।

कहा हैं —


#उपेहि_सरणं_बुद्धं_धम्मं_सङ्घञ्च_तादिनं ।।

यदि सचमुच तुझे दु:ख से भय हैं ,यदि सचमुच तुझे दु:ख अप्रिय लगता हैं तो तू बुद्ध, धम्म और संघ सदृश रत्नों की शरण ग्रहण कर ।”

श्रावस्ती की एक सत्य घटना हैं ।

सेठ अनाथपिण्डिक की दासी की पुत्री थी पूर्णा । वह घर में पानी भरने का काम करती थी । अपने मालिक के माध्यम से वह भगवान के संपर्क में आयी और उनके उपदेशों से धम्म संविग्न हो, स्त्रोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित हो गई ।
एक समय मिथ्या धारणा रखनेवाले ब्राह्मण को देखकर उसे फटकारते हुए कहा कि नदी में स्नान करने से पाप कर्म धुल जाते हैं, भव मुक्त हो जा सकते हैं, ऐसी मिथ्या धारणा रखने से कोई फायदा नहीं हैं । नदी के पानी में सुबह, दोपहर और शाम स्नान करने से पाप कभी धुलते नहीं हैं , ऐसा होता तो सदा पानी में रहने वाले प्राणी भवचक्र से मुक्त हो जाते । मछली का पूरा जीवन पानी में ही होता हैं, क्या वह जीवन मुक्ति या भवचक्र मुक्ति पायेगी ?

ब्राह्मण को समझाते हुए पूर्णा ने ये स्वस्ति वचन कहें –

#उपेहि_सरणं_बुद्धं_धम्मं_सङ्घञ्च_तादिनं ,
#समादियाहि_सीलानि,
#तं_ते_अत्थाय_हेहिति ।”

“तू शील, सदाचार का पालन कर, इसी से तेरी अर्थसिद्धि होगी ।”

अकालिक और सदाकालिन बुद्ध धम्म हैं गुणकारी ।

यह धम्मा “अतीता”, “अनागता” और
“पच्चुपन्ना” हैं ।

मिथ्या धारणा का विनाश ही दु:ख से छुटकारा पाने का प्रारंभ हैं ।

🙏🏻
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सबका मंगल हो

#सब्ब_पापस्स_अकरणं_कुसलस्स_उपसम्पदा।* #सचित_परियोदपनं_एतं_बुद्धानं_सासनं।।”* तथागत बुद्ध

तथागत बुद्ध जेतवन में विहार कर रहे थे। सायंकाल को आनंद के प्रश्न के उत्तर में शास्ता बुद्ध ने कहा :-

“सारे पापो का न करना, पुण्य का संचय करना। अपने चित्त को परिशुद्ध करना, यही बुद्धों का सासन हैं।”

“खन्ती परमं तपो तितिक्खा,
निब्बानं परमं वदन्ति बुद्धा।”

अर्थात :-
“सहनशीलता और क्षमा-शीलता परम तप है। बुद्ध निर्वाण को परम तप बतलाते हैं।”

बुद्ध धम्म तीन शब्दों में समाविष्ट हैं :-

शील, समाधि और प्रज्ञा।

दान का भी बड़ा महत्व है।
एक गाथा में कहा है :-

“दानं ददन्तु सद्धाय, सीलं रक्खन्तु सब्बदा।
भावना भिरता होन्तु, एतं बुद्धां सासनं।।”

“श्रद्धा पूर्वक दान करो,
सर्वदा शील का पालन करो,
ध्यान (भावना) में रत रहो,
यही बौद्धों की शिक्षा हैं।”

शील का अभिप्राय हैं सदाचार का पालन।

समाधि का मतलब हैं निर्मल मन की एकाग्रता।

प्रज्ञा का अर्थ हैं यथाभूत सम्यक ज्ञान।

अष्टांग मार्ग में आठवा हैं सम्यक समाधि।

जो व्यक्ति अपने जीवन में पंचशील का पालन करता हैं, वह सम्यक समाधि प्राप्त करती हैं।

“पाणातिपाता वेरमणी” शील का पालन करने वाले व्यक्ति का मन मैत्रीपूर्ण होता हैं। ऐसे मैत्रीपूर्ण चित्त वाले समाधि को लाभी होता हैं – तुवटं चित्तं समाधियति- चित्त शिघ्र एकाग्र होता हैं।

बौद्ध दर्शन में समाधि के दो भेद किये जाते हैं :-
(१) उपचार समाधि (समाधि के समीप की अवस्था)
(२) अर्पण समाधि (संपूर्ण समाधि)।
यह आवश्यक नहीं हैं कि निर्वाण प्राप्ति के लिए प्रयत्न करने वाले मनुष्य को चारों ध्यान की प्राप्ति हो ही, और न ही केवल उपचार समाधि या अर्पण समाधि के बल पर कोई श्रोतापन्न आदि हो सकता हैं। श्रोतापन्न आदि होता हैं केवल विपश्यना द्वारा। जिसका मतलब हैं संसार को अनित्य स्वरूप, दु:ख स्वरूप तथा अनात्म स्वरूप देख सकने की शक्ति। लेकिन हाँ यह विपश्यना केवल उपचार समाधि की अवस्था में प्राप्त होता हैं।

तथागत बुद्ध ने कहा :-

“भिक्खुओं ! यह जो चित्त की एकाग्रता हैं – यही समाधि हैं। चारों स्मृति उपस्थान हैं समाधि के निमित्त, और चारों सम्यक प्रयत्न हैं समाधि की सामग्री। इन्हीं आठों धर्मो के सेवन करने, भावना करने तथा बढाने का नाम हैं समाधि -भावना।”

नमो बुद्धाय

🙏
🙏
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“Gautum Buddha and The Brahmin”

Gautum Buddha was sitting under a banyan tree. One day, a furious Brahmin came to him and started abusing him.

The Brahmin thought that Gautum Buddha would reciprocate in the same manner, but to his utter surprise, there was not the slightest change in the expression on his face.

Now, the Brahmin became more furious. He hurled more and more abuses at Buddha. However, Gautum.Buddha was completely unmoved. Actually there was a look of compassion on his face. Ultimately the Brahmin was tired of abusing him. He asked, ” I have been abusing you like anything, but why are you not angry at all ? “

Gautum.Buddha calmly replied, ” My dear brother, I have not accepted a single abuse from you. “

” But you heard all of them, didn’t you? ” The Brahmin argued half-heartedly. Buddha said, ” I do not need the abuses, so why should I even hear them? “

Now the Brahmin was even more puzzled. He could not understand the calm reply from Gautum Buddha. Looking at his disturbed face, Buddha further explained, ” All those abuses remain with you. “

” It cannot be possible. I have hurled all of them at you, ” the Brahmin persisted.

Buddha calmly repeated his reply, ” But I have not accepted even a single abuse from you ! Dear brother, suppose you give some coins to somebody, and if he does not accept them, with whom will those coins remain? “

The Brahmin replied, ” If I have given the coins and not needed by someone, then naturally they would remain with me.

With a meaningful smile on his face, Buddha said, ” Now you are right. The same has happened with your abuses. You came here and hurled abuses at me, but I have not accepted a single abuse from you. Hence, all those abuses remain with you only. So there is no reason to be angry with you. “

The Brahmin remained speechless. He was ashamed of his behavior and begged for Buddha’s forgiveness.

Lesson to Learn from This Story:

Inner calmness and peace are keys to contented life. My Advice is Live life as per your goals and ambition in life. You know who you are and what you want in life, So dont respond to what person said about you in anger. Control your anger with patience and calmness. That is biggest Strength of Wise men-Hassan Ali.

Never take someone for granted,Hold every person Close to your Heart because you might wake up one day and realise that you have lost a diamond while you were too busy collecting stones. ” Remember this always in life.

बुद्ध हैं अंतिम सत्य

भगवान बुद्ध दुनिया का एक रहस्य हैं। भगवान तो बहुत हुए, लेकिन बुद्ध ने चेतना के जिस शिखर को छुआ है वैसा किसी और ने नहीं। बुद्ध का पूरा जीवन सत्य की खोज और निर्वाण को पा लेने में ही लग गया। उन्होंने मानव मनोविज्ञान और दुख के हर पहलू पर कहा और उसके समाधान बताए।

यह रिकॉर्ड है कि बुद्ध ने जितना कहा और जितना समझाया उतना किसी और ने नहीं। धरती पर अभी तक ऐसा कोई नहीं हुआ जो बुद्ध के बराबर कह गया। सैंकड़ों ग्रंथ है जो उनके प्रवचनों से भरे पड़े हैं और आश्चर्य कि उनमें कहीं भी दोहराव नहीं है। जिसने बुद्ध को पड़ा और समझा वह भीक्षु हुए बगैर बच नहीं सकता।

बुध का रास्ता दुख से निजात पाकर निर्वाण अर्थात शाश्वत आनंद में स्‍थित हो जाने का रास्ता है। बुद्ध का जन्म किसी राष्ट्र, धर्म या प्रांत की क्रांति नहीं है बल्कि की बुद्ध के जन्म से व्यवस्थित धर्म के मार्ग पर पहली बार कोई वैश्विक क्रांति हुई है। बु्द्ध से पहले धर्म, योग और ध्यान सिर्फ दार्शनिकों का विरोधाभाषिक विज्ञान ही था। काशी या कांची में बैठकर लोग माथाफोड़ी करते रहते थे।

पश्चिम के बुद्धिजीवी और वैज्ञानिक बुद्ध और योग को पिछले कुछ वर्षों से बहुत ही गंभीरता से ले रहे हैं। चीन, जापान, श्रीलंका और भारत सहित दुनिया के अनेकों बौद्ध राष्ट्रों के बौद्ध मठों में पश्चिमी जगत की तादाद बड़ी है। सभी अब यह जानने लगे हैं कि पश्चिमी धर्मों में जो बाते हैं वे बौद्ध धर्म से ही ली गई है, क्योंकि बौद्ध धर्म ईसा मसीह से 500 साल पूर्व पूरे विश्व में फैल चुका था।

दुनिया का ऐसा कोई हिस्सा नहीं बचा था जहाँ बौद्ध भिक्षुओं के कदम न पड़े हों। दुनिया भर के हर इलाके से खुदाई में भगवान बुद्ध की प्रतिमा निकलती है। दुनिया की सर्वाधिक प्रतिमाओं का रिकॉर्ड भी बुद्ध के नाम दर्ज है।

उन मुल्कों के मस्तिष्क में शांति, बुद्धि और जागरूकता नहीं है जिन्होंने बुद्ध को अपने मुल्क से खदेड़ दिया है, भविष्य में भी कभी नहीं रहेगी। शांति, बुद्धि और जागरूकता के बगैर विश्व का कोई भविष्य नहीं है, इसीलिए विद्वानों द्वारा कहा जाता रहा है कि बुद्ध ही है दुनिया का भविष्य। वही है अंतिम दार्शनिक सत्य।

बौद्ध धर्म को सिर्फ दो शब्दों में व्यक्त किया जा सकता है- अभ्यास और जागरूकता।”- दलाई लामा

एस धम्मो सनंतनो अर्थात यही है सनातन धर्म। बु‍द्ध का मार्ग ही सच्चे अर्थों में धर्म का मार्ग है। दोनों तरह की अतियों से अलग एकदम स्पष्ट और साफ। जिन्होंने इसे नहीं जाना उन्होंने कुछ नहीं जाना। बुद्ध को महात्मा या स्वामी कहने वाले उन्हें कतई नहीं जानते। बुद्ध सिर्फ बुद्ध जैसे हैं।

हिंदू और बौद्ध दोनों ही धर्मों के लिए बुद्ध का होना अर्थात धर्म का होना है। बुद्ध इस भारत की आत्मा हैं। बुद्ध को जानने से भारत भी जाना हुआ माना जाएगा। बुद्ध को जानना अर्थात धर्म को जानना है।

यह संयोग ही है कि वैशाख पूर्णिमा के दिन बुद्ध का जन्म नेपाल के लुम्बिनी में ईसा पूर्व 563 को हुआ। इसी दिन 528 ईसा पूर्व उन्होंने बोधगया में एक वृक्ष के ‍नीचे जाना कि सत्य क्या है और इसी दिन वे 483 ईसा पूर्व को 80 वर्ष की उम्र में दुनिया को कुशीनगर में अलविदा कह गए।

गौतम बुद्ध का जन्म ईसा से 563 साल पहले नेपाल के लुम्बिनी वन में हुआ। उनकी माता कपिलवस्तु की महारानी महामाया देवी जब अपने नैहर देवदह जा रही थीं, तो उन्होंने रास्ते में लुम्बिनी वन में बुद्ध को जन्म दिया। कपिलवस्तु और देवदह के बीच नौतनवा स्टेशन से 8 मील दूर पश्चिम में रुक्मिनदेई नामक स्थान के पास उस काल में लुम्बिनी वन हुआ करता था।

उनका जन्म नाम सिद्धार्थ रखा गया। सिद्धार्थ के पिता शुद्धोदन कपिलवस्तु के राजा थे और उनका सम्मान नेपाल ही नहीं समूचे भारत में था। सिद्धार्थ की मौसी गौतमी ने उनका लालन-पालन किया क्योंकि सिद्धार्थ के जन्म के सात दिन बाद ही उनकी माँ का देहांत हो गया था।

मैत्रेय बुद्ध : ओशो की एक किताब अनुसार भगवान बुद्ध ने भिक्षुओं के आग्रह पर उन्हें वचन दिया था कि मैं ‘मैत्रेय’ से पुन: जन्म लूँगा। तब से अब तक 2500 साल बीत गए। कहा जाता है कि बुद्ध ने इस बीच कई बार जन्म लेने का प्रयास किया, लेकिन कुछ कारण ऐसे बने कि वे जन्म नहीं ले पाए। अंतत: थियोसॉफिकल सोसाइटी ने जे. कृष्णमूर्ति के भीतर उन्हें अवतरित होने के लिए सारे इंतजाम किए थे, लेकिन वह प्रयास भी असफल सि‍द्ध हुआ। अंतत: ओशो रजनीश ने उन्हें अपने शरीर में अवतरित होने की अनुमति दे दी थी।

बुद्ध दर्शन के मुख्‍य तत्व : चार आर्य सत्य, आष्टांगिक मार्ग, प्रतीत्यसमुत्पाद, अव्याकृत प्रश्नों पर बुद्ध का मौन, बुद्ध कथाएँ, अनात्मवाद और निर्वाण। बुद्ध ने अपने उपदेश पालि भाषा में दिए, जो त्रिपिटकों में संकलित हैं। त्रिपिटकों का एक भाग है धम्मपद। प्रत्येक व्यक्ति को तथागत बुद्ध के बारे में जानना चाहिए।

☸सतिपट्ठान☸

“इस नश्वर संसार में ध्रुव शाश्वत ना कोई।
पानी के से बुलबुले भंग-भंग ही होय।।
किसको मैं शाश्वत कहूं नित्य अचल ध्रुव सार?
नष्ट होय ज्यों बुद बुदा, विषयों का व्यापार।।
नन्हा-सा परमाणु कण,या विशाल ब्रह्मांड।
नश्वर ही है मिट्टी कण, या मिट्टी का भाण्ड।।”

संसार नश्वर है, ध्रुव नहीं है, प्रत्येक पदार्थ वस्तु आदि क्षण भंगुर है, प्रति पल बदलते रहते है- यह सत्य जानने के लिए विपश्यना साधना करना आवश्यक है ।

विपश्यना साधना क्या है?

सारा ऐंद्रिय जगत अनित्य है, पर हम इन पांच इन्द्रिय द्वारो पर सदा विषयो का स्वागत करते रहते है, नित्य मानकर उनका उपभोग करते रहते हैं।

कभी कोई मनोहारी रूप देखते है, कभी मनोहारी गंध सूंघते है, कभी मनोहारी शब्द सुनते हैं, कभी मनोहारी रस चखते हैं, कभी मनोहारी स्पर्श करते हैं।

और जब कभी ध्यान में बैठते है तो उन मनोहारी रूपो, शब्दों, रसो, और स्पर्शों की मीठी यादें मन में उभरती हैं। चित्त धारा पर उत्पन्न हुई यह नन्ही नन्ही विचार की तरंगे शरीर पर सूक्ष्म सूक्ष्म संवेदनाओ की सिहरन पैदा करती है, जो की हमें अत्यंत प्रिय लगती है।

जब हम इन नन्ही नन्ही तरंगो को उनके अनित्य धर्मा सच्चाई के बोध में देखने लगते हैं तो मिथ्या आनंद से विभोर होकर, यानि अंधे होकर इनका अनुगमन करने की आदत से छुटकारा पाते हैं।

केवल देखना है, सच्चाई के प्रति जागरूक रहना है, अनित्य स्वभाव के प्रति सचेत, अप्रमत रहना है।

इस अभ्यास के द्वारा अंधेपन में उत्पन्न हुए सारे विकार सहज ही छूट जाते हैं।

यही विपश्यना साधना का अभ्यास है।

विपश्यना साधना के लिए तथागत ने सतिपट्ठान बतलाया है।

सतिपट्ठान क्या है?

स्मृति के प्रस्थान यानी सतिपट्ठान।

एक समय भगवान कुरू देश में कुरूओं के निगम (कस्बा) कम्मासदम में विहार करते थे ।

वहाँ भगवान ने भिक्खुओं को संबोधित किया —

भिक्खुओं !
भदन्त ! कह भिक्खुओं ने भगवान को उत्तर दिया ।

भगवान ने कहा —

यह चार स्मृति-प्रस्थान (सतिपट्ठान) हैं —

1) कायानुपश्यना,
2) वेदनानुपश्यना,
3) चित्तानुपश्यना,
4) धम्मानुपश्यना,

. वह सत्वों की विशुद्धि के लिए, शोक कष्ट के विनाश के लिए, दु:ख-दौर्मनस्य के अतिक्रमण के लिए,
सत्य की प्राप्ति के लिए, निर्वाण की प्राप्ति के लिए अकेला मार्ग हैं ।

भिक्खुओं ! जो कोई इन चार सति-पट्ठान की भली प्रकार 7 वर्ष भावना करे, उसको दो फलों में एक फल अवश्य मिलता हैं –

1) इसी जन्म में अर्हत्व का साक्षात्कार,
2) उपाधि शेष होने पर अनागामी भाव ।

बुद्ध ने आगे कहा –

रहने दो भिक्खुओं ! सात वर्ष, जो कोई इन चार स्मृति-प्रस्थानों को भली प्रकार से 6 वर्ष भावना करे, 5 वर्ष भावना करे, 4 वर्ष भावना करे, 3 वर्ष भावना करे, 2 वर्ष भावना करे, 1 वर्ष भावना करे, 7 मास भावना करे,6 मास भावना करे, 5 मास भावना करे, 4 मास भावना करे, 3 मास भावना करे, 2 मास भावना करे, 1 मास भावना करे, 15 दिन भावना करे, या एक 7 दिन भावना करे तो भी उसको यही फल अवश्य मिलते हैं ।
भगवान ने यह कहा, संतुष्ट हो, उन भिक्खुओं ने भगवान के भाषण को अभिनन्दित किया ।

“अपने भीतर जो करे, सही सत्य की खोज। दूर होय अज्ञान सब, जगे मुक्ति का बोध।।”

नमो बुद्धाय

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समुदाय_में_धार्मिक_गतिविधियाँ

समुदाय में धार्मिक गतिविधियाँ करना बुद्ध के उपदेशों के प्रसार और प्रसार के लिए महत्वपूर्ण कार्यों में से एक है। वार्ड और गांव, परिवारों से बने होते हैं। वार्ड और गांवों के समूह कस्बों, जिलों, प्रभागों, राज्यों और देश बनाते हैं। इस प्रकार, यदि प्रत्येक परिवार और समुदाय में बुद्ध की शिक्षाएं स्थापित की जा सकती हैं, तो पूरे देश में बुद्ध शिक्षाएं विकसित होंगी। जब हम बुद्ध की शिक्षाओं का पालन करते हैं, तो हम न केवल वर्तमान जीवन में, बल्कि अगले अस्तित्व में भी खुशी और सफलता प्राप्त करेंगे। इसके अलावा, हमारे अंतिम अस्तित्व में, हम निबाण की परम शांति प्राप्त करेंगे। बौद्ध होना बहुत कीमती है। ऐसे बहुमूल्य जीवन का आनंद लेने में सक्षम होने के लिए, अज्ञानी व्यक्तियों और गलत दर्शकों को बुद्धिमान व्यक्तियों और सही दर्शकों में परिवर्तित किया जाना चाहिए। ऐसा करने के लिए, गांवों और टाउनशिप में संगठनों का गठन किया जाना चाहिए और व्याख्यान और चर्चा बड़े पैमाने पर होनी चाहिए। बुद्ध की सलाह के अनुसार, व्यक्ति को न केवल सराहनीय कार्य करने चाहिए बल्कि दूसरों से ऐसा करने का आग्रह करना चाहिए। बौद्ध साहित्य में चार प्रकार के व्यक्तियों का उल्लेख इस प्रकार है: — (१) एक व्यक्ति जो स्वयं मेधावी कर्म करता है लेकिन दूसरों से ऐसा करने का आग्रह नहीं करता है; (२) ऐसा व्यक्ति जो दूसरों से मेधावी कर्म करने का आग्रह करता है लेकिन वह स्वयं ऐसा नहीं करता है; (३) ऐसा व्यक्ति जो स्वयं मेधावी कर्म नहीं करता और न ही दूसरों से ऐसा करने का आग्रह करता है; (४) ऐसा व्यक्ति जो स्वयं मेधावी कर्म करता है और दूसरों से ऐसा करने का आग्रह करता है। उनके अलग-अलग नजरिए और गतिविधियाँ उनके लिए अलग-अलग फायदे हैं। जब वे भविष्य के अस्तित्व में अपने मेधावी कर्मों का लाभ उठाते हैं: – पहला व्यक्ति महान धन प्राप्त करता है, लेकिन उसके पास साहचर्य का अभाव होता है; – दूसरा व्यक्ति साहचर्य का आनंद लेता है लेकिन उसके पास धन का अभाव होता है; – तीसरा व्यक्ति न तो धन और न ही साहचर्य का आनंद लेता है; – चौथा व्यक्ति धन और साहचर्य दोनों का आनंद लेता है। इस प्रवचन के अनुसार, यह स्पष्ट है कि एक व्यक्ति, जो स्वयं मेधावी कर्म करता है और दूसरों से ऐसा करने का आग्रह करता है, चार प्रकार के व्यक्तियों में सबसे बड़ा लाभ उठाएगा। इसलिए धार्मिक गतिविधियों में भाग लेने के लिए समुदाय का नेतृत्व करना बहुत महत्वपूर्ण है। समुदाय में धार्मिक गतिविधियों को करने के दो मुख्य उद्देश्य हैं: (1) न केवल वर्तमान जीवन में बल्कि भविष्य के अस्तित्वों में भी समुदाय के सदस्यों के लिए शांति और समृद्धि लाना और (2) समुदाय के बीच एकता को बढ़ावा देना। इसलिए तकनीकी रूप से उन्नत देशों के लोगों द्वारा केवल भौतिक प्रगति द्वारा शांति और खुशी हासिल नहीं की जा सकती है। जीवन में सच्ची शांति और सुख प्राप्त करने के लिए नैतिक प्रगति बहुत आवश्यक है। बुद्ध के उपदेश वास्तव में सभी मनुष्यों के लिए आध्यात्मिक और नैतिक प्रगति प्रस्तुत कर सकते हैं। इसलिए, प्रत्येक नागरिक को समुदाय के साथ-साथ पूरे देश में बुद्ध के उपदेशों के प्रचार के महान मिशनरी कार्य में भाग लेना चाहिए ताकि सभी लोग आध्यात्मिक और नैतिक रूप से पूर्ण सीमा तक शांति और खुशी का आनंद लेने के लिए विकसित हों।

मार्ग का ज्ञान

एक समय भगवान बुद्ध श्रावस्ती में मिगारमाता के पुष्वाराम मे विहार कर रहे थे. धम्म का ज्ञान प्राप्त करने और बुद्ध को सुनने के लिये मोग्गालन नामक ब्राहमण लेखाकार भी अकसर वहां आता था. एक दिन वह कुछ जल्दी आ गया और भगवान को अकेले पाकर बोला, “भगवन, मेरे मन में यह प्रश्न उठता है कि आपके पास बहुत दूर से आनेवाले कुछ लोग तो कम समय में ही परम ज्ञान को उपलब्ध हो जाते हैं पर बहुत से लोग लंबे समय से आपके निकट रहते हुए भी इस सुख की प्राप्ति नही कर पाते हैं. आप जैसा अद्भुत शिक्षक और पथप्रदर्शक होते हुये भी कुछ को निर्वाण सुख प्राप्त होता है और कुछ को नही? तो भगवन, अपनी करुणा से ही आप सबको निर्वाण सुख दे कर भवसागर से मुक्ति क्यों नही प्रदान कर देते?”

बुद्ध ने मोग्गालन से कहा, ” ब्राहमण, मै तुम्हें इस प्रश्न का उत्तर दूंगा, लेकिन पहले तुम मुझे यह बताओ कि क्या तुम राजगृह (राजगिरी) आने-जाने का मार्ग अच्छी तरह से जानते हो?”

मोग्गालन मे कहा, “गौतम, मैं निश्चित ही राजगृह का आने-जाने का मार्ग भली प्रकार से जानता हूँ.”

बुद्ध ने कहा, “अब तुम मुझे बताओ, कोई आदमी आता है और तुमसे राजगृह का मार्ग पूछता है लेकिन उसे छोड़कर वह अलग मार्ग पकड़ लेता है. तुम उसे पूर्व में जाने को कहते हो पर वह पश्चिम में चल देता है. फिर एक दूसरा आदमी आता है और वह भी तुमसे रास्ता पूछता है और तुम उसे उसे भी ठीक-ठीक वैसे ही रास्ता बताते हो जैसा तुमने पहले को बताया था और वह तुम्हारे बताये रास्ते पर चलकर सकुशल राजगृह पहुँच जाता है. यदि पहले व्यक्ति ने तुम्हारे बताये मार्ग का अनुसरण नहीं किया तो क्या इसमें तुम्हारा दोष बनता है?”

ब्राहमण बोला, “भगवन, यदि पहला व्यक्ति मेरी बात पर ध्यान नहीं देता तो मैं क्या कर सकता हूँ? मेरा काम तो केवल रास्ता बताना है.”

भगवान बुद्ध बोले, “तो ब्राहमण, तथागत का काम भी केवल मार्ग बताना होता है.”

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